दिए भटका कन्हैया भव अपने
(मधुगीति 250812)
दिए भटका कन्हैया भव अपने,
जीव लेने लगे हैं निज सपने;
गए वे भूल आए क्या करने,
भूले वे आए जिसे थे वरने!
भाये वे सम्पदा विधाता की,
सृष्टि की झाँकियाँ अनूठी सी,
सृष्ट की प्रकृतियाँ प्रकम्पित सी,
विकृतियाँ भायीं भव्य प्रकटी सी!
आत्म अपनी कहाँ लखी थी गई,
तरंग मन की चित्त तैरा रही;
तन कहाँ साथ निभा था पाया,
तटस्थित होके कुछ न तक पाया!
तदस्थिति जानी कहाँ स्रोत लभा,
सुषुप्ति भान कहाँ अपना हुआ;
टकटकी लगा नित्य जो था लखा,
ध्यान उसका कहाँ कभी था किया!
मंच सारा सजाया है जिसने,
खिलौने उसके भाने हम हैं लगे;
लँगोटी ‘मधु’ की लूटना चाहे,
मुरलिया श्याम की कहाँ हैं सुने!
— गोपाल बघेल ‘मधु’
