गीत/नवगीत

कौरव से कर्म क्रूर करा !

कौरव से कर्म क्रूर करा, पाण्डव सुधा;
आक्रोश रोष भव में फुरा, साधते विधा !

अर्जुन का शौर्य सूझ बूझ, दग्ध भाव रस;
आलोक ऊर्ध्व ले के चले, महा- विश्व रच !
बाहर है जितना युद्ध, कहाँ अन्दर भी कम;
हर शाख़ शकुनि बैठे, नियंत्रण है अपेक्षित !

शासन की चूक लघु भी, बीज विष के बो रही;
हर भाव-जड़ता बिपदा बनी, सामने खड़ी !
ताण्डव करा के कृष्ण आज, भुवन ध्वज जमा;
बनके नरेन्द्र ‘मधु’ के सखा, शोधते धरा !

✍🏻 गोपाल बघेल ‘मधु’