कविता

शिशुपाल वध की कथा

हस्तिनापुर में,ज़ब राज सिंहासन के करण
गृह क्लेश होने लगा, गृह युद्ध होता देखकर
हस्तिनापुर सम्राट महाराज धृतराष्ट्र ने,
हस्तिनापुर के विभाजन का निर्णय लिया,
तथा हस्तिनापुर की भूमि का बंजर भूभाग
खांडवप्रस्थ युधिष्ठिर एवं पांडवों को सौंप दिया
पांडवों ने खांडवप्रस्थ की बंजर भूमि पर अपने
परिश्रम तथा श्री कृष्ण के सहयोग से इंद्रप्रस्थ का
भव्य निर्माण किया, .
धर्मराज युधिष्ठिर ने इंद्रप्रस्थ के निर्माण के उपरांत
पृथ्वी पर न्याय,धर्म की स्थापना करने हेतु
श्री कृष्णा और देव ऋषि नारद के परामर्श पर.
राजसूय यज्ञ करने का निर्णय लिया.
धर्मराज युधिष्ठिर ने, इस अति शुभ आयोजन का
बलराम दाऊ के सग वासुदेव श्री कृष्ण को
अपने हाथों से प्रथम निमंत्रण दिया.
सगे संबंधियों विद्वान ऋषि मुनियों और आर्यावर्त
के सभी राजा महाराजाओं को
इस महायज्ञ में आने का न्योता भेजा गया.
पांडवों के राज्य की शोभा देखने को चेदि नरेश,
शिशुपाल का भी इंद्रप्रस्थ में आगमन हुआ.
प्रश्न उठा जब अग्रपूजा का किसे चुना जाए,
पांडवों ने तब सर्वसम्मति से योग्यता के आधार,
अपनी खुशी से वासुदेव श्री कृष्ण को चुना,
किंतु शिशुपाल ने इस निर्णय का विरोध किया
वासुदेव श्री कृष्ण की जय -जयकार हो,
ये चेदि नरेश को मंजूर नहीं था,
शिशुपाल ने श्री कृष्ण को अपशब्द से संबोधित
करते हुए कहा ये ग्वाला अग्रपूजा का अधिकारी
कैसे हो सकता है, इसके तो माता-पिता का भी
कुछ नहीं है पता.
शिशुपाल ने श्री कृष्ण और देवी द्रौपदी के
पवित्र रिश्ते पर भी प्रश्न खड़ा किया.
अब अर्जुन और भीम के सब्र का बांध टूट गया
तथा उन्हें भयंकर क्रोध आया
श्री कृष्ण ये कहकर उनके क्रोध को शांत कराया
जो कहता है, शिशुपाल को कह लेने दो,
शिशुपाल अब गिन रहा है अपने जीवन के,
अंतिम पलों को,
शिशुपाल पर है अब काल की छाया,
बलराम दाऊ ने श्री कृष्ण से किया प्रश्न
हे कन्हैया तुम क्यों सुन रहे हो, इस दुष्ट के अपशब्दो को
ज़ब तुम अपने सुदर्शन चक्र से,
तत्काल इस पापी को, मृत्यु दंड दे सकते हो,
श्री कृष्ण ने कहा दाऊ मैंने, बुआ को,
शिशुपाल की मां को वचन दिया था,
की शिशुपाल के ऐसे सौ”अपराध क्षमा करूंगा
जो मृत्युदंड के योग्य हैं,
श्री कृष्ण को अपशब्द कहने पर,
भीष्म पितामह को भी क्रोध आया
शिशुपाल ने भीष्म पितामह का भी किया बड़ा अपमान
ये, सुनकर भीष्म पितामह ने कहा क्रोध में आकर
शिशुपाल यदि यह मेरे प्रिय युधिष्ठिर का,
राजसूय यज्ञ न होता तो, महादेव की सौगंध
मै, तेरी जीवा को
काट कर फेंक देता.
श्री कृष्ण ने भीष्म पितामह को शांत कराया,
श्री कृष्ण ने कहा, पितामह आप चिंता न करें,
इस दुष्ट का अंत अब नजदीक आया
श्री कृष्ण ने शिशुपाल को चेतावनी देकर कहा,
हे दुष्ट अपने अधर्म अपने पापों की संख्या याद
रख रहे हो न तुम,
अब बस एक अंतिम अधर्म और कर
सकते हो तुम, .
शिशुपाल ने नहीं मानी कृष्ण की चेतावनी कृष्ण
की बात.
तू मेरा क्या बिगाड़ लेगा ग्वाले,ये कहकर
कृष्ण को शिशुपाल ने पूरे किए,
अपने सौं, अपराध,
फिर सुदर्शन चक्र धारण करके,
श्री कृष्ण ने कहा सावधान शिशुपाल,
आगे न कहना एक शब्द और,
वरना तेरी मृत्यु तय है, इस बार
शिशुपाल ने नहीं सुनी कृष्ण की,
अंतिम चेतावनी,
शिशुपाल ने कहां छलिया है तू
क्या है तेरी बात का मान
जब पापी के पाप का घड़ा भर आया
तब श्री कृष्ण ने अपना सुदर्शन चक्र चला कर
इस वसुंधरा को, शिशुपाल
एक अधर्मी के बोझ से मुक्त कराया
कृपा निधान ने, शिशुपाल पर कृपा करके
शिशुपाल को दिया अपना निज धाम

— आकाश शर्मा आज़ाद

आकाश शर्मा आज़ाद

आगरा उप्र M 6396405065