जीवन बाग बहार है गृहिणी….
ताजगी फूलों की, सौरभ है गृहिणी,
बहारों का अलबेला मौसम है गृहिणी।।
घर-परिवार की रौनक है गृहिणी,
समस्या का सहज निदान है गृहिणी।।
स्नेह सूत्र में पिरोती माणिक-मोती,
रेशम बंध नाज़ुक डोर है गृहिणी।।
छत्र-छाया, आँचल माया-दुलार का,
रिमझिम मनभावन बरखा है गृहिणी।।
अटल चट्टान, कभी महिषासुर मर्दिनी,
अपने लाडले का कवच-कुंडल गृहिणी।।
प्रिया, सहचरी, अर्धांगिनी, परिणीता,
घर-परिवार का सबल आधार है गृहिणी।।
मात दुर्गा-सी विविध रूप लेती गृहिणी,
देवी-सा पूजन नहीं, सम्मान चाहे गृहिणी।।
