कविता

जीवन बाग बहार है गृहिणी….

ताजगी फूलों की, सौरभ है गृहिणी,

बहारों का अलबेला मौसम है गृहिणी।।

घर-परिवार की रौनक है गृहिणी,

समस्या का सहज निदान है गृहिणी।।

स्नेह सूत्र में पिरोती माणिक-मोती,

रेशम बंध नाज़ुक डोर है गृहिणी।।

छत्र-छाया, आँचल माया-दुलार का,

रिमझिम मनभावन बरखा है गृहिणी।।

अटल चट्टान, कभी महिषासुर मर्दिनी,

अपने लाडले का कवच-कुंडल गृहिणी।।

प्रिया, सहचरी, अर्धांगिनी, परिणीता,

घर-परिवार का सबल आधार है गृहिणी।।

मात दुर्गा-सी विविध रूप लेती गृहिणी,

देवी-सा पूजन नहीं, सम्मान चाहे गृहिणी।।

*चंचल जैन

मुलुंड,मुंबई ४०००७८