कहानी – कुकी
लंदन की ठंडी शाम! एयरपोर्ट से बाहर आते ही जगमगाती सड़कें! कौशल जी और शुभ्रा जी को पहली बार लगा कि जैसे किसी फेयरीलैंड में आ गए हो! पहली बार विदेशी धरती पर आने का उत्साह और उससे भी कहीं बढ़कर था दो साल बाद बेटे शौर्य से मिलने की खुशी! पांच साल हुए उनके बेटे को यहां आए…इस बीच दो बार भारत आया था पर मां का दिल हफ्ते – दो- हफ्तों से कहां भरने वाला था! सब्जी-भाजी लेने भर के लिए घर से निकलने वाली शुभ्रा आज बेटे से मिलने सात समंदर पार चली आई!
एयरपोर्ट के बाहर बेटे को देखकर कैसे रो पड़ी थी वो! शौर्य ने आगे बढ़कर दोनों के पांव छू लिए! शुभ्रा जी की गर्वित नज़रें पति से मिली। हिन्दुस्तानी संस्कारों की जड़ें कच्ची नहीं पड़ी थी।
“बेटा! मिश्का नहीं आई?” गाड़ी में उन्होंने पूछा!
“मां! वो घर में जरा…आप घर चलो न!”
कार रुकी! घर आ गया था! दरवाज़ा खुलते ही एक छोटी-सी बच्ची दौड़कर आई। घुँघराले बाल, डार्क स्किन…! शुभ्रा जी कुछ पूछती उससे पहले ही…!
“Hello grand ma, Hello grandpa.”
वो ठिठक गईं। “ये बच्ची! कौन है ये?”
मिश्का ने पांव छुए और मुस्कुराकर कहा- “मॉम! सी इज कुकी! माय डॉटर!”
“डॉटर?” कौशल जी चौंक उठे!
शौर्य आगे बढ़ा, “पापा वो…हमने इसे एडॉप्ट किया है अफ्रीकन है! आप लोग तो जानते ही हैं पहली प्रेग्नेंसी के बाद ही मिश्का को डॉक्टर ने साफ कह दिया था कि आगे प्रेग्नेंसी में मुश्किल है इसलिए हमने…आपको बताना चाहता था फिर आपने कहा यहां आ रहे हैं तो हमने सोचा, आने के बाद ही…!”
शुभ्रा जी के चेहरे पर अजीब-सी सख्ती आ गई! “अपना बच्चा न हुआ तो किसी और की संतान पालनी ज़रूरी थी क्या? ऊपर से पराई नस्ल की!”
कमरा अचानक से भारी हो गया! कुकी धीरे से उनके पास आई, हाथ में छोटा-सा टेडी बियर पकड़े हुए- “This is for you, Grandma!”
शुभ्रा जी ने हाथ झटक दिया, “चलो हटो! मुझे ये सब नहीं चाहिए!”
कुकी की आँखें भीग गई! वो चुपचाप मिश्का की गोद में छिप गई।
उस रात शौर्य बेचैन था! “मां कभी कुकी को एक्सेप्ट नहीं करेगी! आख़िर इनसब में इसकी क्या गलती है यार!”
मिश्का ने उसका हाथ थामा— ” परेशान मत हो शौर्य! Give her some time…मां जरूर समझेगी हमारी उलझन।”
अगली सुबह! बाहर स्नोफॉल! शुभ्रा जी अपने कमरे में गुमसुम से बैठी थी…और नन्हीं कुकी अपनी कॉपी पर कुछ लिख रही थी। उसने हिंदी-इंग्लिश मिलाकर कुछ लिखा-
“I lv Mom-Dad-Grandma-Grandpa Pyaru और स्टिक फिगर्स बनाकर शुभ्रा जी के बिस्तर पर रख दिया।
उन्होंने कागज उठाया। मोम सा कुछ पिघलने लगा…बरसों पहले बेटे शौर्य ने बिल्कुल ऐसा ही कार्ड बनाया था। वो आहिस्ते से कुकी के पास बैठी, उसे गोद में लिया! सिर चूमा और दुलार से बोली- “तेरे बाल बहुत सुंदर है गुड़िया, पर ये तो बहुत उलझे हैं! मैं ठीक कर दूं! ठहर..” कहकर उन्होंने बैग से नारियल तेल की शीशी निकाली और उसके घुँघराले बालों में लगाने लगी।
कुकी चिहुंककर बोली- “Thank u grandma!” उसने शुभ्रा जी के गाल पर पुच्ची दे दी!
उनकी आंखों में इस विदेशी पोती के लिए अब कोई शिकायत नहीं थी! था तो सिर्फ दुलार और अपनापन! दरवाज़े पर कौशल जी और शौर्य खड़े थे। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा— “लगता है हमारी फैमिली अब पूरी हो गई है।”
मौसम खुशनुमा था…बाहर ठंडे बर्फ की बारिश और अंदर रिश्तों की गर्माहट!
प्यार अपनी जगह बना ही लेता है कैसे भी…कहीं भी!
— मौसमी चंद्रा
