कविता

ये सच है

ये सच है कि एक दिन मैं न रहूंगा
तुम ढूंढोगे मुझे
पर मैं कहीं नजर न आऊंगा

जब मेरी याद हद से ज्यादा सताने लगे
पढ़ लेना मेरी किताबें
मैं तुमसे बातें करने लगूंगा

अक्षर- अक्षर मेरी सांसों की गर्माहट
तुमको एहसास कराएगी
मैं सदियों से जिंदा हूं सदियों तक
मेरी किताबें तुम्हें बतायेंगी

चाहे जितने युग आएं- जाएं
सूरज तब भी था और आगे भी रहेगा…।

— मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

नाम - मुकेश कुमार ऋषि वर्मा एम.ए., आई.डी.जी. बाॅम्बे सहित अन्य 5 प्रमाणपत्रीय कोर्स पत्रकारिता- आर्यावर्त केसरी, एकलव्य मानव संदेश सदस्य- मीडिया फोरम आॅफ इंडिया सहित 4 अन्य सामाजिक संगठनों में सदस्य अभिनय- कई क्षेत्रीय फिल्मों व अलबमों में प्रकाशन- दो लघु काव्य पुस्तिकायें व देशभर में हजारों रचनायें प्रकाशित मुख्य आजीविका- कृषि, मजदूरी, कम्यूनिकेशन शाॅप पता- गाँव रिहावली, फतेहाबाद, आगरा-283111