श्रमिक
श्रमिक धरा हम तुम है सारे।
कोई यहाँ विशेष न प्यारे।।
सबके काम अलग बस होते।
करने पड़ते हँसते रोते।।
इसका हल्का उसका भारी।
कुछ की बैठे जिम्मेदारी।।
कोई भाग-दौड़ है करता।
ठकोई बैठे बैठे खटता।।
श्रमिक भला श्रम से कब डरता।
किसका पेट बिना श्रम भरता।।
श्रमिक बने सब घूम रहे हैं।
सबके अपने भाग्य रचे हैं।।
करे जरूरत सबकी पूरी।
चाहे पास हो या फिर दूरी।।
रूप रंग का भेद न होता।
श्रम के बीज श्रमिक ही बोता।
श्रम सम्मान सभी को मिलता।
जन परिवार देश है खिलता।।
श्रमिक देश का मान बढ़ाते।
उन्नति के पथ पर ले जाते।।
बड़ी निराली इनकी लीला।
रुखा-सूखा, सुखद कंटीला।।
श्रमिक ही करते जग उद्धार।
इनको सभी दीजिए प्यार।।
