दिवास्वप्न
कमली बैठे-बैठे जलते तवे को घूर रही थी । शराबी पति की हाड़ तोड़ती मार खाकर रोटी बनाने का किसका मन करता है ? तभी उसे पति की आवाज सुनाई दी “कमली , उठ चल । तुझे बाबे का ढाबा बहुत पसंद है ना । वहाँ खाना खाकर आते हैं । शादी के बाद पहली बार हमने जहाँ खाना खाया था ना ।”
कमली ने गैस बंद कर दी और उठ खड़ी हुई । परंतु, यह क्या! पतिदेव तो अंदर बिस्तर पर पैर फैलाए सो रहे थे । नशा शायद अभी उतरा ना था । उसने सोचा क्या यह कोई दिवास्वप्न था या मुझे भी बिन पिए दारू का नशा चढ़ गया है और वह चूल्हा जलाकर जल्दी-जल्दी रोटी बेलने लगी ।
— बृज बाला दौलतानी
