एकाग्रता जीत की धार है
मन की नोक पर
टिकी हुई एक दृष्टि
लक्ष्य सन्नाटा
शब्द थम जाते
जब ध्यान बोल उठता
राह चमकती
बिखरा जो मन
हार की छाया बढ़े
एकाग्र विजय
साँसों की लय में
सपना बुनता जाए
धैर्य का दीप
क्षण में साधी हुई
पूरी उम्र की ताकत
ध्यान की धार
शोर से दूर
मौन में जन्मी शक्ति
कर्म को दिशा
जो ठहर सका
वही आगे बढ़ पाया
समय झुक गया
एक बिंदु पर
सारा ब्रह्म समाया
जीत मुस्काई
— डॉ. अशोक
