मैं असभ्य हूँ
हाँ! मैं असभ्य हूँ
नहीं समझता मैं
जेब की जबान
आदमी होने की
यहीं पहली शर्त है
तो मुझे आदमी…
होना भी मंजूर नहीं।
फटे हाल में जिंदा है
यदि मेरी पूर्ण स्वतंत्रता
तो मैं हर अमीर पोशाक
जो बंधक बना कर नोचती
करती है कुंठित धार
जीवन के गौरव की
उन सबका स्वाहा! स्वाहा!
परहेज है मुझे उस समाज से
जो चुपड़ी-चुपड़ी में लगा
घूण की तरह खोखला
कर देता है नर समाज को।
मैं विद्रोही ही सही
लेकिन किसी बंदूक से
नहीं मरूँगा आसानी से
जब तब आग है सीने में
तब तक राग है जीने में
विषकंठ क्यों! विष पीने में!
कुचला जाऊँ यदि,फिर भी!
कंटक सा चुभकर पैर में
प्रतिघात करूँगा बचाने मनुष्यता।
— डॉ. ज्ञानीचोर
