भारतीय संस्कृति में वसंत पंचमी
वसंत पंचमी एक ओर जहां ऋतुराज के आगमन का दिन है, वहीं यह विद्या की देवी और वीणावादिनी सरस्वती की पूजा का भी दिन है। ग्रंथों के अनुसार वाग्देवी सरस्वती ब्रह्ममस्वरूपा, कामधेनु तथा समस्त देवों की प्रतिनिधि हैं। ये ही विद्या, बुद्धि और ज्ञान की देवी हैं। इसीलिए इस दिन विद्या तथा संगीत की देवी की पूजा की जाती है। अमित तेजस्वनी व अनंत गुणशालिनी देवी सरस्वती की पूजा-आराधना के लिए माघमास की पंचमी तिथि निर्धारित की गयी हैं। वसंत पंचमी को इनका आविर्भाव दिवस माना जाता है। अतः वागीश्वरी जयंती व श्रीपंचमी नाम से भी यह तिथि प्रसिद्ध है। वसंत पंचमी को त्योहार के रूप में मनाए जाने के पीछे कई तरह की मान्यताएं हैं। ऐसा माना जाता है कि वसंत पंचमी के दिन ही देवी सरस्वती का अवतरण हुआ था। मान्यता है कि ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना करने के बाद मनुष्य की रचना की। मनुष्य की रचना के बाद उन्होंने अनुभव किया कि मनुष्य की रचना मात्र से ही सृष्टि की गति को संचालित नहीं किया जा सकता। उन्होंने अनुभव किया कि निःशब्द सृष्टि का औचित्य नहीं है, क्योंकि शब्दहीनता के कारण विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं था और अभिव्यक्ति के माध्यम के नहीं होने के कारण ज्ञान का प्रसार नहीं हो पा रहा था। इसके बाद उन्होंने विष्णु से अनुमति लेकर एक चतुर्भुजी स्त्री की रचना की, जिसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में था। अन्य दोनों हाथों में पुस्तक और माला थी। ब्रह्म जी ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया। जैसे ही देवी ने वीणा का मधुरनाद किया, संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई। जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया। पवन चलने से सरसराहट होने लगी। तब ब्रह्म ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा। सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावाद और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। ये विद्या और बुद्धि प्रदाता हैं। संगीत की उत्पत्ति करने के कारण ये संगीत की देवी भी हैं। वसंत पंचमी के दिन को इनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं। सरस्वती को साहित्य, संगीत, कला की देवी माना जाता है। सरस्वती की वीणा संगीत की, पुस्तक विचार की और मयूर वाहन कला की अभिव्यक्ति है। आम भाषा में सरस्वती को शिक्षा की देवी माना गया है। शब्द के माधुर्य और रस से युक्त होने के कारण इनका नाम सरस्वती पड़ा। सरस्वती ने जब अपनी वीणा को झंकृत किया, तो समस्त सृष्टि में नाद की पहली अनुगूंज हुई। चूंकि सरस्वती का अवतरण माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को हुआ था, अतः इस दिन को वसंत पंचमी के रूप में मनाया जाता है। मां सरस्वती को ज्ञान, बुद्धि, कला और कौशल की देवी माना जाता है. यही वजह है ज्ञान के पिपासु लोग मां सरस्वती का आशीर्वाद पाने के लिए उनकी वंदना करते हैं। मां सरस्वती हमें विद्या और ज्ञान अर्जित करने के अलावा और भी कई महत्वपूर्ण संकेत देती हैं। देवी सरस्वती के संपूर्ण आभा मंडल से हमें जीवन पथ पर सफलता पाने के अनेक संकेत मिलते हैं। श्वेत वस्त्रों में मां सरस्वती बेहद आकर्षक और तेजस्वी नजर आती हैं। उनका प्रिय रंग श्वेत है जो सात्विकता, सहजता और सरलता का प्रतीक है। देवी सरस्वती के श्वेत वस्त्रों से हमें दो संकेत मिलते हैं। पहला, हमारा ज्ञान निर्मल हो। हमें जो भी शिक्षा और ज्ञान मिले वह सकारात्मक हो। दूसरा, हमारा चरित्र अच्छा हो। हमारे जीवन में किसी भी प्रकार की बुराई न हो। ऋग्देव में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए कहा गया है-’’प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु’’। अर्थात ये परम चेतना हैं। सरस्वती के रूप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं। इसमें जो आचार और मेधा है उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं। इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है। पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण ने सरस्वती से खुश होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी और यूं भारत के कई हिस्सों में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की भी पूजा होने लगी जो आज तक जारी है। महर्षियों और मनीषियों ने कहा है कि वसंत पंचमी को पूरी श्रद्धा से सरस्वती की पूजा करनी चाहिए। माना जाता है कि इसी दिन शब्दों की शक्ति मनुष्य की झोली में आई थी। बच्चों को इस दिन अक्षर ज्ञान कराना और बोलना सिखाना शुभ माना जाता है। अतः सरस्वती देवी की इस वार्षिक पूजा के साथ ही बालकों के अक्षरारंभ एव विद्यारंभ की तिथियों पर भी सरस्वती पूजन का विधान है। वसंत पंचमी को श्री पंचमी भी कहा जाता है जो सुख, समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करने का परिचायक है। इस दिन पतंग उड़ाने की भी परंपरा है जो मनुष्य के मन में भरे उल्लास को प्रकट करने का माध्यम है। हिन्दू धर्म में पीले (वासंती) रंग को शुभ माना गया है। वासंती रंग शुद्ध और सात्विक प्रवृत्ति का परिचायक है। यह सादगी और निर्मलता का भी प्रतीक है। वसंत पंचमी के दिन वासंती यानी पीले रंग के वस्त्र धारण करने के साथ पीले रंग के चावल, पीला रायता, वासंती पूरियाँ, पीले लड्डू व केसर की खीर बनाई जाती है। माँ सरस्वती को श्वेत रंग पसंद है और चावल सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। इसीलिए इस दिन माँ सरस्वती को चावल का भोग लगाया जाता है। देवी सरस्वती कमल के फूल पर विराजमान दिखती हैं। जिस तरह से कमल का फूल पानी में रहता है लेकिन पानी की एक भी बूंद उस पर नहीं रुकती उसी तरह से झूठ, कपट, बुरी संगत जैसी बुराइयों का जीवन में कोई स्थान न रहे। वसंत पंचमी में सूर्य उत्तरायण होता है, जो यह संदेश देता है कि हमें सूर्य की तरह गंभीर और प्रखर बनना चाहिए। सभी ऋतुओं में वसंत ही ऐसी ऋतु है, जिसमें सभी ऋतुओं की अपेक्षा धरती की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। इस दौरान फसल पकती है। पेड़-पौधां में नई कोपलें फूटती हैं। वसंत पंचमी पर अबूझ मुहूर्त होने के कारण कई जोड़े परिणय सूत्र में बंध जाते हैं। इस दिन अबूझ सावा होता है यानी विवाह के लिए किसी पंडित से मुहूर्त निकलवाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। यह दिन अपने आपमें ही खास माना जाता है तथा इस दिन हुए मांगलिक कार्य जीवन भर शुभता प्रदान करते हैं। वसंत पंचमी यानी प्रकृति के उत्सव का दिन। वीणा वाहिनी माँ सरस्वती की आराधना का यह पर्व मंद-शीतल वायु के प्रवाह, प्रकृति की पीली चुनरी के साथ नए उत्साह के संचार का संदेश लाता है। वसंत पंचमी के पीछे एक मान्यता यह भी है कि इसी दिन भागीरथ की तपस्या के चलते गंगा का अवतरण हुआ था, जिससे समूची धरती खुशहाल हो गई। माघ माह के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली पंचमी पर गंगा स्नान का काफी महत्व है। वसंत पंचमी के बारे में यह भी मान्यता है कि इस दिन शिवजी ने पार्वती से विवाह के लिए हामी भरी थी। इस दिन शिवजी का लगन चढ़ा था। प्राचीन काल में वसंत पंचमी का दिन मदनोत्सव और वसंतोत्सव के रूप में मनाया जाता था। इस दिन स्त्रियां अपने पति की पूजा कामदेव के रूप में करती थीं। वसंत पंचमी के दिन ही कामदेव और रति ने पहली बार मानव हदय में प्रेम एवं आकर्षण का संचार किया था और तभी से यह दिन वसंतोत्सव तथा मदनोत्सव के रूप में मनाया जाने लगा। वसंत पंचमी इस बात का संकेत देती है कि धरती से अब शरद की विदाई हो चुकी है और ऐसी ऋतु आ चुकी है जो जीव जंतुओं तथा पेड़-पौधों में नवजीवन का संचार कर देगी। भारतीय संस्कृति में अलग-अलग ऋतुओं का अपना महत्व है। हमारे व्रत और त्योहार ऋतुओं के साथ-साथ चलते हैं। वसंत ऋतु की पंचमी तिथि का अपना पौराणिक और धार्मिक महत्व है। वसंत पंचमी प्रकृति का यौवन है। जिसका रहन-सहन प्रकृति से अलग न पड़ गया हो। जो प्रकृति के रंग में रंग गया हो। वह मनुष्य बिना कहे ही वसंत पंचमी का अनुभव करता है। अलबत्ता वह एक ही समय पर सबके हृदयों में प्रवेश नहीं करता। वसंत पंचमी के दिन से ही होली आरंभ हो जाती है और उसी दिन पहली बार गुलाल उड़ाई जाती है। इस दिन से होली और धमार का गाना प्रारंभ हो जाता है। लोग वासंती वस्त्र धारण कर गायन, वाद्य एवं नृत्य में विभोर हो जाते हैं।
— आकांक्षा यादव
