पाषाण होता इंसान
अस्थि-मांस का पुतला,
पाषाण हो गया है,
संचित स्मृतियों के जाल में,
इंसान कैद हो गया है!
हर पत्थर टीस पुरानी,
इक ‘अधूरी चाह’ है,
कोई दफ़्न मलाल है,
तो कोई तिरस्कार की आह है!
विश्वासघातों की गिरफ़्त में,
साँसों का दम घुट रहा है,
खुद को ही ढोने की कोशिश में,
अस्तित्व भीतर से टूट रहा है!
हर कदम पर दुखों की किरचें हैं,
चलना दुश्वार हो गया है,
यादों का बोझ ढोता मानव,
खुद ही पे भार हो गया है!
खुद ही पे भार हो गया है!!
— अंजु गुप्ता ‘अक्षरा’
