अटल: कवि हृदय, राष्ट्र नायक
बीज रोपा था अटल ने,
‘कमल’ खिला नैतिक बल से।
देदीप्यमान है उनका परचम,
चहुँदिशा, सकल नभ-थल में।।
अंतस् में कविता बहती थी,
भावों की बहती सरिता थी।
राजनीति में कविता लिखी,
पर राजनीति न कविता में दिखी।।
हृदय भावों का पावन संगम,
वाणी में था अद्भुत संयम।
झुकना उनको कभी न आया,
गौरव राष्ट्र का हमेशा बढ़ाया ।।
कारगिल में हुंकार भरी,
शत्रु की हिम्मत पस्त हुई।
वीर धरा का मान बढ़ाया,
विजय तिरंगा वहाँ लहराया।।
मतभेद रहे सिद्धांतों के,
पर मनभेद को न स्थान दिया।
वे पद पर रहकर साधक थे,
राष्ट्र-हित के ही आराधक थे।
अंजु गुप्ता ‘अक्षरा’
