रात बाकी है
नित्य नवीन सपने और उन्हें पूरा करने का जुनून ! जीवन से धीरे-धीरे सब कुछ छीन लिया । अहसास होने में सांझ होने लगी ।
आस-पास नज़र दौड़ाई कोई भी नहीं किसे अपना कहूं ? माँ बाबूजी को मेरा अतिमहत्वाकांक्षी होना गंवारा नहीं था । मित्र सब मुझसे जलते थे , पत्नी मुझसे भी दो कदम आगे बढ़ सैर-सपाटे और एशो-आराम की चाहत में कब दूर निकल गई पता ही नहीं चला ।
दोष उसे क्यों दूं ? मैं भी तो बात-बात में उससे कह देता था– “धनवान होना और धनवानों जैसा जीवन जीना कोई बिरले ही सीख पाते हैं ।”
संध्या इस बात को दिल पर ले ली शेयर बाजार के तौर-तरीकों को समझ अपना स्त्री धन बेच शेयरों की खरीद-बिक्री करते हुए देखते ही देखते मुझसे चार कदम आगे निकल गई ।
बच्चे छात्रावास में, माँ बाबूजी को महानगर की दुनिया रास नहीं आई, वह पैतृक आवास को छोड़ अब कभी उसके पास नहीं आते ।
शाम के समय कमरे में बैठे-बैठे बोरियत होने लगी , सोचा चल कर जरा खूली हवा में सैर कर लूँ ।
गार्डन एरिया के सभी पौधे मुरझा कर सूख गये थे, बिल्कुल अपनों की तरह अपनापन लूट चुका था ।
कुछ भी ऐसा शेष नहीं बचा, जिसे देख कर जीने की चाहत हो । सोचा पापा को फोन लगा लूं , ओह उनका नंबर तो मेरे पास है ही नहीं।
छन्न-छन्न-छन्नाक… सपनों का शीश महल टूट कर बिखर गया । किरीचें पावों में चुभ जाती अगर जूते नहीं पहने होते, सांझ ढलने वाली है । माँ सही कहती थी–
“पैसे तो देह-व्यापार करने वाली भी कमा लेती है , रिश्तों की कदर कर रिश्तों की कमाई हर किसी के वश में नहीं है ।”
अभी रात बाकी है, कल ही मैं गांव जाऊंगा । श्रवण नहीं बन सकता कोई बात नहीं, स्वजनों के श्रेणी में माँ की नज़रों में आ जाऊं तो अपराध बोध कम हो जायेगा।
— आरती रॉय
