ग़ज़ल
मिलने आएं नज़र वो झुकाए हुए।
मुस्कुराहट को अपनी छुपाए हुए।।
मैंने देखा जो उनको बहक ही गया।
इस तरह थे लवों को सजाए हुए।।
वो पहन नाक में नथ सितारों जड़ी।
आये महफ़िल में टीका लगाए हुए।।
पांव में बज रही थी वो पाज़ेब यूं।
कैसे उतरे परी पर लगाए हुए।।
सज रही उनके चम्पा चमेली लटों में।
कोई दास्तां थी दामन छुपाए हुए।।
— प्रीती श्री वास्तव
