लघुकथा – छोटी मछली बडी मछली
बहुत दिमाग ख़राब हो गया था अनारे बाबू का . स्टाफ वाले बड़े बाबू ने पार्टी दी थी . उनके बेटे को एक विदेशी कम्पनी में जॉब मिल गया था .इसी ख़ुशी में सभी ऑफिस वालों को बुलाया था । बड़े साहब भी आये थे और कुछ अफसर भी थे । पीने पिलाने का दौर भी चल रहा था । अनारे बाबु को जाने क्या सूझी या कुछ ज्यादा चढ़ गई हाथ में गिलास पकडे वो भी उस तरफ पहुँच गए जहाँ सभी अफसर लोगों की बैठक चल रही थी सभी नशे में मस्त हो रहे थे उनकी हंसी मजाक के बीच अनारे बाबु भी कुछ बोल पड़े । बस इतने में तो बड़े साहब उखड गए , साले छोटे लोगों को मुँह लगाना बिलकुल गलत हे सर पर बैठने लगते हें अपनी औकात भूल जाते हैँ । इस साले अनारे को बोलो होश में रहे , लोअर कैटेगरी वाले .
अब साहब ने कौन सी लोअर कैटेगरी की बात की थी , अफसर और बाबु वाली या कोई और ये तो साहब ही जाने लेकिन अनारे बाबु के दिमाग में तो बिजली कौंधी सीधे जातिगत टिप्पणी समझे वो तो । . साले ये ऊँची जात के अफसर लोग क्या समझते हें अपने आप को ? मनुवादी साले आदमी आदमी में भेद करते हें . अनारे बाबु की आवाज ऊँची होने लगी , तभी कुछ स्टाफ वालों ने माहौल ख़राब होने से पहले अनारे बाबु को जबरदस्ती घर की और रवाना कर दिया .
घर पहुँचते पहुँचते अनारे बाबु का नशा काफूर हो चुका था , कुछ अफ़सोस भी होने लगा था कि साहब लोगों से नाहक उलझे लेकिन गुस्सा बरकरार था और बेइज्जती का भान भी. घर में घुसते ही नजर पड़ी आगे हाल में एक कोने में उकडूँ बैठे खाना खा रहे छगन पर जो न केवल उनकी घरवाली के गाँव का रहने वाला था बल्कि उसका दूर का रिश्तेदार भी लगता था । गाँव मे बेरोजगार रहते छगन को पत्नी के कहने से ले आये थे अपने शहर और दूर बस्ती में एक कमरा दिलवा दिया था रहने को , तथा नगरपालिका में नौकरी भी लगवा दी थी सफाई कामगार की । छगन कभी कभी आ जाता था अनारे बाबू के घर.कुछ काम भी कर देता था और कुछ खाने का सामान भी ले जाता था ।.
अनारे बाबु को बिलकुल पसंद नहीं था छगन का घर आना , पर घरवाली के कारण चुप रहना पड़ता था । लेकिन आज उसे घर के हाल में बैठ कर खाना खाते देख तो उनका पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया । क्या कर रहे हो तुम यहाँ ? खाना घर ले जाओ या बाहर बैठ के खाओ , चलो उठो । घर वाली अनारे बाबु को चुप कराती तब तक डरता सकुचाता छगन अपना खाना समेट कर दरवाजे के बाहर निकल गया था। अनारे बाबु ने अपनी ओर घूरती घरवाली को देखा फिर बरस पड़े ,साले बिना ओकात वाले छोटे लोग चले आते हें सिर पर बैठने .जरा सा ढंग से क्या बोले घर में घुसने लग गए । बोल देना इसको जहाँ है वहीँ रहे . अपनी औकात न भूले स्साला ……कहीं का । एक जातिगत गाली देते हुए अचानक चुप हो गए अनारे बाबू . उन्हें याद आ गया खुद का अपमान. घरवाली कुछ समझ ही नही पा रही थी कि मामला क्या है । उसे क्या मालूम था कि यह छोटी मछली बडी मछली का खेल चल रहा है । अनारे बाबू जो तीर छगन पर चला रहे हें उसी तीर का शिकार होके तो वो घर आए थे.
— महेश शर्मा
