दोष किसे दूँ?
वही ब्रह्मांड,
वही दुनिया,
वही मुल्क,
वही प्रकृति,
वही पर्यावरण,
वही आबो-हवा,
वही नैतिकता,
वही संस्कार,
वही जीव-जगत…
फिर भी—
गिरते स्तर के लिए
दोष किसे दूँ?
मानव,
अब मानव नहीं रहा—
दानव हो चुका है।
संस्कार,
अब संस्कार नहीं रहे—
सिर्फ़ दिखावे का आवरण बन चुके हैं।
नैतिकता,
अब आत्मबोध नहीं—
दूसरों से की जाने वाली उम्मीद बन गई है।
इंसान ढीठ हो चला है,
ढिठाई ऐसी कि
हर जगह दिखता है—
“मैं… और सिर्फ़ मैं!”
किसी के पास
अब हृदय शेष नहीं,
जिसे त्यागना चाहिए
उसे कसकर पकड़ा जाता है।
होड़ मची है—
अपने स्तर को
सबसे नीचे ले जाने की,
और गर्व से
दिखाने की।
तो कहो…
इस पतन के लिए
दोष किसे दूँ?
— राजेन्द्र लाहिरी
