जिसने मरना सीख लिया है जीने का अधिकार उसी को
भारतीय जनता पार्टी एक ऐसी राजनैतिक पार्टी रही है जिसे उठाने या डुबाने के लिए किसी अन्य दल की आवश्यकता नहीं है . इसके जितने समर्थक अन्दर हैं डुबाने के लिए षड्यंत्रकारी भी अन्दर ही हैं. याने कुल मिलाकर पूर्णतः आत्मनिर्भर दल है. जब इसका विकास हो रहा था हिंदूवादी दल के रूप में तो समाजवादी बनने की चुल भी इसे मची थी. राष्ट्रवाद को छोड़कर धर्मनिरपेक्ष बनने का परिणाम पूरी लोकसभा में केवल 2 सीट तक पहुँच कर भी इसने देख लिया था.
वो तो भला हो राम मंदिर का जो इसे फिर से तार दिया. वीपी सिंह ने मंडल लाकर देश को जलाया तो कमंडल ने इसके लडखडाते क़दमों को सहारा दिया . लेकिन कमंडल को इसने क्या दिया. हर पार्टी का एक समर्थक वोट होता है जिसके लिए वो पार्टी काम करती हैं. और पार्टियां मुस्लिमों और पिछड़ी हुए वर्ग की राजनीति करती आई, उनके उत्थान की न सिर्फ बात करती आई इतना ही नहीं इसके लिए सवर्ण वर्ग को कुचलते आई. आरक्षण देती आई. एक राजनैतिक दल के रूप में आरक्षण एक एसा मुद्दा बन गया कि कोंई भी पार्टी चाहते हुए भी उसे हटा नहीं सकती. इसे मजबूरी कहा जा सकता है क्योंकि इसे छेड़ना आग से खेलने के बराबर है.
लेकिन इसके मूल में सवर्ण समाज का संगठित न होना है. वे सड़कों पर आते नहीं है. कांशीराम हों ,कांग्रेस हो या अन्य दल, सब उधार बैठे हैं कि कब समानता की बात हो या सवर्ण समाज के अधिकार की बात हो वे इसे दलित समाज का उत्पीडन बताकर मैदान में उतर जाते हैं. सवर्ण के लिए कोंई मां और बाप नहीं. इसका कारण एकमात्र यह है कि उनके पास न तो मुसलमान या दलितों की तरह सड़कों पर उतरकर हंगामा मचाने का न तो समय है और न ही मानसिकता. इस वर्ग ने अभी तक अपनी इसी निष्क्रियता का दंड भुगता है और आगे भी भुगतेगा. और भाजपा तो एक मात्र ऐसी पार्टी है जिसे अपने वोटर, बुद्धीजीवियों या कवि कलाकारों से ज्यादा चिता दूसरों की होती है ताकि उस पर पक्षपात का आरोप न लगे.
जवाहरलाल की आरक्षण विरोधी एक बात को छोड़कर मैं उनकी किसी भी अन्य बात का समर्थक नहीं हु. आरक्षण के सम्बन्ध में उनकी जिस बात को मोदी जी मजबूरी में देश विरोधी बताते हैं मैं व्यक्तिगत रूप से देश के हित में मानता हु कि देश के विकास के लिए कुशलता की अधिक जरूरत है. नौकरियों में आरक्षण के कारण कार्यकुशलता नहीं है इसीलिये भारत अभी तक उतना विकास नहीं कर पाया, शिक्षा या चिकित्सा का इसीलिये स्तर गिरा हुआ है.
पर चिंता कौन करे कांग्रेस हो या भाजपा के बड़े नेता किसी के भी बच्चे न सरकारी स्कूल में पदते हैं न ही सरकारी अस्पताल में आरक्षण वाले डाक्टर्स से इलाज करवाते हैं.
मैं जब छोटा था तब मंडल कमीशन के विरोध में कार्य करता था तो लोग कहते थे तुम्हे तो इससे लाभ ही होगा तुम क्यों विरोध कर रहे हो? तब मैं एक ही बात कहता था कि लाभ देश को होगा. क्योंकि मेरी जाति समाज से हिन्दू समाज और देश बड़ा है. गोल्ड मैडल लेने के बाद भी मुझे आरक्षण की वजह से नौकरी नहीं मिल पाई थी ये मेरे लिए अच्छा ही हुआ. पर सबके साथ ऐसा थोड़े ही होगा.
हमेशा कहा जाता है की अपनी लाइन बड़ी करो. लेकिन किसी भी सरकार ने पिछड़े समाज को आगे बदने के लिए प्रेरित करने के बजाय दुसरे समाज की लाइन छोटी करने का ही काम किया है. पिछड़े वर्ग को बढाना है तो उन्हें शिक्षा] चिकित्सा की भरपूर सुविधा उपलब्ध कराई जाए, कौन विरोध करेगा. पर इसके लिए सवर्णों के पैर में जंजीर डालना ये केवल पाप नहीं राष्ट्र द्रोह के बराबर है. इससे न किसी की समाज की स्थिति में सुधार हो सकता है न देश का विकास. लेकिन ये कोंई भी दल नहीं करना चाहेगा. भाजपा भी अपने पैर पर कुल्हाड़ी क्यों मारेगी ? न मारे ये उसकी समझदारी है …. पर पके हुए घाव पर फिर कुल्हाड़ी मार रही है ये उसकी मूर्खता ही है ?
इतिहास में भी कुछ घटनाओं को छोड़कर जातिगत भेदभाव कहीं देखने में नहीं आता. लेकिन वामपंथी विचारधारा का प्रभाव एसा हुआ कि सवर्ण समाज खुद को दोषी मानने लगा. उसे लगने लगा अन्य दल कि वास्तव में उनके पूर्वजों से छुआछूत नाम की भयंकर भूल हुई है. इसीलिये कभी भी उसने अपने साथ हो रहे अय्याय का विरोध नहीं किया.
ये यु जी सी ड्राफ्ट कोंई भाजपा का बनाया नहीं थी भाजपा के आने से पहले का बना हुआ था. पर इसे लेकर तो भाजपा ही आई न . क्या मंत्रालय या पी एम् ओ ने आँख मीच रही थी या उन वोटों के लिए अंधा हो गया था जिनके पहले से ही कई मजबूत दावेदार बैठे हैं. कहावत गलत नहीं है…. आधी छोड़ पूरी को धावे , आधी रहे न पूरी पावे. भाजपा के साथ भी यही होगा. अब ये मुद्दा ऐसा बन जाएगा कि वापस लेंगे तो भी विरोध होगा और नहीं लेंगे तो भी विरोध ही होगा. बिलकुल गौ रक्षा की तरह गौरक्षा का बिल लायेंगे तो भी कांग्रेस और सपा आदि पार्टियां संसद में विरोध करेगी. और सड़क पर अविमुक्तेश्वरानंद इन्हें खलनायक बनाकर छोड़ देंगे.
मैं कई बार कह चुका हु कि न ये गांधी को छोड़ पाएंगे और न गोडसे को गले लगा पायेंगे. और अंत में रोकर कहेंगे … न माया मिली न राम ! राम और कांसीराम दोनों की पूजा एक साथ नहीं हो पाएगी. दलितों का विकास होना चाहिए, उनके साथ अन्याय नहीं होना चाहिए तो इसके लिए अन्य जातियों पर अन्याय क्यों किया जाए ?
वाल्मीकि के वंशजों को सम्मान मिले तो इसका मतलब नाह नहीं कि तुलसी दास के वंशजो को तिल-तिल कर मारा जाये. समाज में तो दोनों के प्रति आदर है, समरसता भी है. पूरा संघ परिवार पञ्च परिवर्तन की बात कर रहा है. समरसता भोज कर रहा है, एकता के नारे लगा रहा है…. तो कौन है जो करोड़ों लोगों की भावना में आग लगाकर अपने हाथ सेकना चाह रहा है ?
समझ में नहीं आ रहा है भाजपा में ये विघ्नसंतोषी लोग हैं षड्यंत्रकारी है या मूर्ख हैं जो प्याज भी खायेंगे और जूते भी. इन नेताओं को कोंई अंतर नहीं पडेगा …. मुझे कहने में कोंई संकोच नहीं है, इन सबके पास सात पुश्तों के खाने के लिए धन हो चुका है, नाम अमर करने की व्यवस्था हो चुकी है. इससे भी मुझे कोंई एतराज नहीं क्योंकि भ्रष्टचार तो जो आयेगा करेगा.
पर इनके चरणों में एक ही निवेदन करूंगा, किसी भी वर्ण के लोग हों सभी भारत माता के बेटे है, एक का मांस पकाकर दुसरे को खिलाने का पाप तो मत करो. पैसा खाओ … नाम यश सब खाओ पर हजारो राष्ट्रभक्तों की त्याग तपस्या को तो मत खाओ. देश की शान्ति और समृद्धि को तो मत खाओ. समरसता को तो मत खाओ. मेरे देश को तो मत खाओ. तुम कितने दिन सत्ता में रहोगे ? पर ये देश तो रहना है इसी जीने लायक तो छोड़ दो ….
गलती चाहे अफसरों ने की हो या ड्राफ्ट बनाने वालों ने …. देश तो जवाब भाजपा से ही मांगेगा. और जवाब उन सबसे भी मांगेगा जो भाजपा के लिए वोट मांगते हैं.
अंत में एक बात फिर उन सबसे कहूँगा जो पीड़ित हैं या होने वाले है कि जो खुलकर आवाज नहीं उठाएगा वो मारा जायेगा….
यह शाश्वत सत्य है…. जिसने मरना सीख लिया है जीने का अधिकार उसी को.
— बाबा सत्यनारायण मौर्य
