गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

नदियां सागर जाती हैं।
सब कुछ वहां लुटाती हैं।
बर्फीले शिखरों से चल,
रेतीले पथ आती हैं।
सर्पीली राहों में चल,
यौवन को लहराती हैं।
नये इरादों में अपने,
लिए विरासत थाती हैं।
पानी के आकर्षण से,
रातों – दिन बतियाती हैं।
उदधि नीर में डूब – डूब,
लहरों से बल खाती हैं ।

— वाई. वेद प्रकाश

वाई. वेद प्रकाश

द्वारा विद्या रमण फाउण्डेशन 121, शंकर नगर,मुराई बाग,डलमऊ, रायबरेली उत्तर प्रदेश 229207 M-9670040890