ग़ज़ल
नदियां सागर जाती हैं।
सब कुछ वहां लुटाती हैं।
बर्फीले शिखरों से चल,
रेतीले पथ आती हैं।
सर्पीली राहों में चल,
यौवन को लहराती हैं।
नये इरादों में अपने,
लिए विरासत थाती हैं।
पानी के आकर्षण से,
रातों – दिन बतियाती हैं।
उदधि नीर में डूब – डूब,
लहरों से बल खाती हैं ।
— वाई. वेद प्रकाश
