लघुकथा

जाति की छतरी

क्लर्क प्रताप नारायण जाटव की मेज़ पर फ़ाइलें रुकती थीं — महीनों, सालों। पर वे रुकती तभी थीं जब लिफ़ाफ़ा न हो।
जब कोई शिकायत करता, तो प्रताप नारायण एक ही जवाब देते।
“तुम हमारे ऊपर अत्याचार कर रहे हो। हम दलित हैं।”
“पर आपने फ़ाइल दबाई है।”
“यह तुम्हारी ऊँची जाति की सोच है।”
शिकायतकर्ता डर जाता। एससी/एसटी एक्ट का नाम सुनते ही पाँव काँपते थे। प्रताप नारायण यह जानते थे। इसीलिए मुस्कुराते थे।
एक दिन एक युवा अफ़सर आई — आईपीएस, अनुसूचित जाति की ही। उसने प्रताप की फ़ाइल उठाई।
“तुम मेरी जाति के हो। शर्म नहीं आती?”
“मैडम, जाति का कार्ड—”
“वह कार्ड अब नहीं चलेगा। आरक्षण अधिकार था — भ्रष्टाचार की ढाल नहीं।”
प्रताप नारायण को निलंबित किया गया। उस दिन पहली बार उनकी जाति काम नहीं आई — क्योंकि सामने वाला भी उसी जाति का था, और उसने जाति से बड़ा ईमान चुना था।
जाति बचाव नहीं, पहचान है — जो भ्रष्टाचार की आड़ बने, वह पहचान नहीं, कलंक है।

— डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला

राजभाषा अधिकारी एनएमडीसी [भारत सरकार का एक उपक्रम] प्रशासनिक कार्यालय, डीआईओएम, दोणीमलै टाउनशिप जिला बेल्लारी - 583118 मो.-8759411563

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