चौदह दिन की आग : ईरान युद्ध का हिसाब और आगे की राह
14 मार्च 2026 को जब ईरान-इजराईल-अमेरिका युद्ध के 14 दिन पूरे हो रहे हैं, तब दुनिया एक ऐसे अध्याय को जी रही है जो इतिहास की किताबों में लंबे समय तक दर्ज रहेगा। 28 फरवरी 2026 की सुबह ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के नाम से शुरू हुई यह जंग न केवल मध्य-पूर्व बल्कि पूरी दुनिया की भू-राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा ढांचे को हिला चुकी है। युद्ध के 14वें दिन आज की तस्वीर यह है कि अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के आंकड़ों के अनुसार अब तक ईरान में 6,000 से अधिक लक्ष्यों पर हमले हो चुके हैं। इनमें ईरान की 160 से 190 बैलिस्टिक मिसाइल लांचर प्रणालियां नष्ट की जा चुकी हैं, लगभग 200 अतिरिक्त लांचर अवरुद्ध या निष्क्रिय कर दिए गए हैं और अनुमान है कि ईरान के पास अब केवल लगभग 150 सक्रिय लांचर बचे हैं। इस युद्ध ने ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की जान ले ली और उनके स्थान पर 8 मार्च को उनके पुत्र मोजतबा खामेनेई को नया सर्वोच्च नेता चुना गया। 90 से अधिक ईरानी नौसेना पोत नष्ट या क्षतिग्रस्त हो चुके हैं और ईरान की इंटरनेट कनेक्टिविटी सामान्य स्तर के महज 4 प्रतिशत तक सिकुड़ गई है।
आज के दिन की ताजा खबर यह है कि अमेरिका मध्य-पूर्व में मरीन टुकड़ियां तैनात कर रहा है। राष्ट्रपति ट्रम्प ने कहा है कि उन्होंने होर्मुज जलसंधि के पास ईरान के तेल नेटवर्क के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण एक द्वीप पर स्थित सैन्य ठिकानों पर हमला किया है। 13 मार्च को पश्चिमी इराक के ऊपर दो अमेरिकी ईंधन भरने वाले विमानों के बीच हवाई दुर्घटना हुई जिसमें 6 अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई। आज दिन के दौरान इजराईली वायु सेना ने शिराज में बैलिस्टिक मिसाइल उत्पादन और भंडारण के लिए प्रयुक्त एक भूमिगत ठिकाने, एक वायु सेना अड्डे और हवाई अड्डे के नियंत्रण टॉवर पर हमले किए। तेहरान में हथियार और रक्षा प्रणाली उत्पादन सुविधाओं और बसीज (Basij) बल की चौकियों को निशाना बनाया गया। अहवाज में IRGC के भूमि बलों और आंतरिक सुरक्षा बलों के मुख्यालयों पर हमले हुए। इन सबके बावजूद आज ‘अंतरराष्ट्रीय कुद्स दिवस’ पर ईरान में सरकार समर्थित रैलियां हुईं जिनमें ‘अमेरिका मुर्दाबाद’ और ‘इजराईल मुर्दाबाद’ के नारे लगाए गए, जो दर्शाता है कि ईरान की सरकार अपने अस्तित्व और मनोबल का प्रदर्शन करने में जुटी है।
इस युद्ध को रोकने के प्रयास जरूर हो रहे हैं लेकिन अब तक वे सफल नहीं हुए हैं। 11 मार्च को ब्लूमबर्ग ने रिपोर्ट किया कि ईरान ने क्षेत्रीय मध्यस्थों को बता दिया है कि युद्धविराम के लिए अमेरिका को यह गारंटी देनी होगी कि न वह और न इजराईल भविष्य में ईरान पर हमला करेगा। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने 12 मार्च को सोशल मीडिया पर लिखा कि उन्होंने रूस और पाकिस्तान के नेताओं से बात कर ईरान की शांति के प्रति प्रतिबद्धता की पुष्टि की है। उन्होंने युद्ध समाप्त करने की तीन शर्तें सार्वजनिक रूप से रखी हैं जिनमें ईरान के वैध अधिकारों की मान्यता, युद्ध हर्जाने का भुगतान और भविष्य में हमला न किए जाने की अंतरराष्ट्रीय गारंटी शामिल हैं। दूसरी ओर ईरान के उप-विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने बताया कि चीन, रूस और फ्रांस ने युद्धविराम के लिए संपर्क किया है। लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ औन एक महीने के अस्थायी युद्धविराम के लिए काम कर रहे हैं।
राष्ट्रपति ट्रम्प ने कहा है कि युद्ध ‘जल्द’ खत्म होगा क्योंकि ‘निशाना बनाने के लिए लगभग कुछ नहीं बचा’, लेकिन साथ ही उन्होंने नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई को ‘कमजोर’ बताकर धमकी दी और कहा ‘जब मैं चाहूंगा, तब यह खत्म होगा।’ ऐसे परस्पर विरोधी संदेश युद्धविराम की कठिनाई को दर्शाते हैं। लेबनान में हिजबुल्लाह ने 2 मार्च से इजराईल पर मिसाइल और ड्रोन हमले शुरू किए थे। इजराईल ने लेबनान में 250 से अधिक जवाबी हमले किए हैं जिनमें 50 से ज्यादा लोग मारे गए और 330 से अधिक घायल हुए। इजराईल ने 3 मार्च को लेबनान में जमीनी अभियान भी शुरू किया और हिजबुल्लाह के खुफिया प्रमुख को बेरूत के दक्षिणी उपनगरों में एक हमले में मार गिराया।
होर्मुज जलसंधि की नाकेबंदी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था पर सबसे गहरी चोट की है। यह वह संकरा समुद्री रास्ता है जिससे दुनिया के 20 प्रतिशत कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति होती है। नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई ने स्पष्ट कर दिया है कि जलसंधि तब तक बंद रहेगी जब तक अमेरिकी सैन्य अड्डे नहीं हटते। ईरान की IRGC नौसेना ने होर्मुज में एक लाइबेरियाई-ध्वज वाले जहाज और एक थाई बल्क कैरियर पर हमला किया है। इराक के बसरा बंदरगाह के पास दो तेल टैंकरों पर हमलों में एक नाविक की मौत हुई और 38 को बचाया गया। इन सब घटनाओं के परिणामस्वरूप कच्चे तेल की कीमतें युद्ध से पहले के लगभग 65 डॉलर से उछलकर 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर चली गई हैं। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने 400 मिलियन बैरल रणनीतिक भंडार जारी किए और अमेरिका ने 172 मिलियन बैरल अपने रणनीतिक भंडार से निकाले, लेकिन बाजार की अस्थिरता बनी हुई है।
भारत के लिए यह युद्ध कई मोर्चों पर चुनौती है। खाड़ी देशों में 90 लाख से अधिक भारतीय प्रवासी रहते हैं जो हर साल 40 अरब डॉलर से अधिक का प्रेषण भारत भेजते हैं। तेल की बढ़ती कीमतें देश के चालू खाते के घाटे को बढ़ाएंगी और सामान्य नागरिकों की जेब पर बोझ डालेंगी। भारत-मध्य-पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) जो G20 में भारत की एक बड़ी कूटनीतिक सफलता थी, अनिश्चितता में फंस गया है। इसके अलावा, ईरान के चाबहार बंदरगाह में भारत का निवेश और वहां से अफगानिस्तान तक पहुंच का रास्ता भी इस युद्ध से प्रभावित हुआ है। यह वह दुखद विडंबना है कि जब भारत विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का जश्न मना रहा है, तब एक दूर के देश में लड़ी जा रही जंग उसकी विकास यात्रा को धक्का दे रही है।
इस युद्ध का एक और आयाम है जो अभी तक पर्दे के पीछे है लेकिन आने वाले दिनों में सामने आ सकता है। यमन के हूती विद्रोहियों ने 2024 में लाल सागर में 150 व्यावसायिक जहाजों पर हमले किए थे जो 2025 में घटकर 7 रह गए थे और 29 सितंबर 2025 के बाद से बंद हो गए थे। लेकिन ईरान-इजराईल युद्ध शुरू होते ही हूती नेतृत्व ने फिर से हमले शुरू करने के संकेत दिए। अगस्त और सितंबर 2025 में इजराईली हमलों ने हूती नेतृत्व को काफी नुकसान पहुंचाया था जिससे वे अभी सीधे दखल से बच रहे हैं, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि यह संयम एक ‘चरणबद्ध उग्रता’ की रणनीति हो सकती है। यदि हूती फिर से लाल सागर में सक्रिय हुए तो वैश्विक व्यापार के लिए एक और बड़ा झटका होगा क्योंकि दुनिया का लगभग 12 प्रतिशत व्यापार स्वेज नहर और लाल सागर के रास्ते होता है।
इस पूरे युद्ध की सबसे बड़ी त्रासदी वह है जो आंकड़ों में नहीं आती — वह हैं ईरान के आम नागरिक, जो न इस युद्ध को चाहते थे, न परमाणु बम की मांग कर रहे थे, लेकिन जिनके घर, स्कूल, अस्पताल और आजीविकाएं इस जंग की भेंट चढ़ रही हैं। 8 मार्च को जब इजराईल ने तेहरान में तेल सुविधाओं को निशाना बनाया, तो शहर काले धुएं में डूब गया जिसे WHO ने जहरीला बताया। ईरान के रेड क्रेसेंट सोसायटी के अनुसार 7 मार्च तक 6,668 से अधिक नागरिक सुविधाओं को निशाना बनाया जा चुका था। जब तक यह युद्ध रुकता नहीं और जब तक कूटनीति और संवाद को हथियारों के शोर के ऊपर तरजीह नहीं मिलती, तब तक यह गिनती बढ़ती रहेगी। यह मानवता की सबसे बुरी असफलताओं में से एक है।
— डॉ. शैलेश शुक्ला
