धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

शिया ईरान में राम का अस्तित्व

यह तो पहले ही सिद्ध हो चुका है कि ना केवल वर्तमान भारत बल्कि सारे विश्व में सृष्टि के आदिकाल से ही ‘वैदिक-सनातन-हिंदुत्व’ विविध रूपों में व्याप्त रहा है। वेदों में इस संस्कृति को प्रदर्शित करने वाला शब्द आता है – आर्य।
‘आर्य’ के अर्थ हैं श्रेष्ठ, गुणवान, श्री संपन्न, उच्च शिक्षित, प्राणिमात्र के प्रति प्रेम व दया रखने वाला, प्रकृति प्रेमी, दयालुता व सहानुभूति जिसका स्वभाव है आदि आदि।

इसी ‘आर्य’ शब्द के आधार पर ‘आर्यावर्त’ जैसी भौगोलिक संज्ञा बनी। इस आर्य-संस्कृति का ही विस्तार वर्तमान ऑस्ट्रेलिया से लेकर मोरक्को तक किसी न किसी रूप में रहा ही है। इनमें से भारत तो पूरी तरह आज भी आर्य-संस्कृति का संवाहक और धारक है ही और अफ़ग़ानिस्तान का पुराना नाम भी ‘आर्यनवेइजो’ और ईरान का नाम ‘आर्यानाम्’ हुआ करता था।

आज मैं बात करूँगा उसी ईरान की जो आजकल इस्लाम की ‘शिया शाखा’ का प्रतिनिधि बना हुआ है। अरबी मुसलमानों के आक्रमण से पहले ईरान में अग्नि के उपासक ‘पारसी’ लोगों का आधिक्य और शासन था। अरबों ने उन्हें ‘आतिश परस्त’ कहा और काफ़िर घोषित करते हुए नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। अधिकांश पारसी मार दिए गए और बचे हुओं में से भी अधिकतर को बलपूर्वक मुसलमान बना दिया गया। कुछ बेचारे किसी तरह जान बचाते हुए भारत की तरफ़ भाग निकले और बलूचिस्तान, सिंध होते हुए तटीय राज्यों – गुजरात और महाराष्ट्र में बस गए। आज भारत में पाए जाने वाले पारसी उन्हीं के वंशज हैं। वैसे जिन्हें अलग से पारसी कहा जाता रहा है, वे भी मूलतः वैदिक परंपरा के अग्नि-उपासक हिंदू ही हैं।

उन्हीं पारसियों के वंशज लगभग तेरह सौ वर्षों से ईरान में मुसलमान बने हुए हैं लेकिन चाहकर भी और सारी कोशिशें करने के बावजूद वे अपनी मूल वैदिक-सनातन संस्कृति से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सके हैं। हमारी संस्कृति और परंपरा में त्रिदेवों में से एक भगवान् विष्णु के अवतार माने जाने वाले अयोध्या-नरेश भगवान् श्रीराम का प्रताप और नाम आज भी ईरान में बाक़ायदा सुरक्षित है।

ईरान की भाषा में प्रांत को ‘ओस्तान’ कहा जाता है और उसकी राजधानी को ‘मरक़ज़’। ईरान में 31 ‘ओस्तान’ अर्थात प्रांत हैं। इन्हीं में से एक है – माज़ंदरान प्रांत। यह प्रांत ईरान के बिलकुल उत्तर में स्थित है और उधर से फिर कैस्पियन सागर (काश्यपीय सागर) शुरु हो जाता है। इसी माज़ंदरान प्रांत में 20 काउंटी हैं जिन्हें ईरानी भाषा में ‘शहरेस्तान’ कहा जाता है। माज़ंदरान के इन 20 ‘शहरेस्तानों’ में से ही एक है – रामसर। इसके नाम का स्पष्ट अर्थ ही है – राम का सरोवर।

दरअसल इस नाम में सरोवर अर्थात् जल का होना भी एक विचित्र संयोग ही है क्योंकि सन् 1971 में विश्वभर के पर्यावरणविदों ने ‘रामसर’ में एक महत्त्वपूर्ण बैठक की थी जो कि इतिहास में ‘रामसर सम्मेलन’ नाम से जानी गयी। इस अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में दुनियाभर के उन आर्द्र क्षेत्रों की सूची बनाकर उन्हें संरक्षित करने का संकल्प लिया गया जो कि प्राकृतिक रूप से जैव विविधता को सँभालने वाले हो सकते हैं। आम तौर पर ऐसे आर्द्र क्षेत्र (Wet Lands) नदी या समुद्र के आस-पास पाए जाते हैं। कभी-कभी कोई झील भी इस सूची में शामिल हो जाती है। भारत में इस तरह के 42 स्थान हैं जिन्हें ‘रामसर साइट्स’ कहा जाता है। महाराष्ट्र की लोनार झील, राजस्थान की साँभर झील, उड़ीसा की चिल्का झील आदि इस तरह के Wet Lands के उदाहरण हैं।

उपरोक्त ‘रामसर काउंटी’ के अतिरिक्त भी ईरान के ‘गुलिस्तान’ प्रांत में ‘रामियान’ नामक शहर भी स्थित है जो पुनः ईरान में राम का अस्तित्व सिद्ध करता है। इसके अलावा माज़ंदरान प्रांत में ही एक अन्य काउंटी का नाम है – Babolsar, जो कि निश्चय ही ‘बाहुबलसर’ का अपभ्रंश होना चाहिए।

कुल मिलाकर बात ये है कि दुनियाभर में ‘वैदिक-सनातन-हिंदुत्व’ विविधता के साथ अस्तित्वमान रहा है और भविष्य में पुनः अपने गौरवशाली रूप को प्राप्त करेगा। कृण्वंतो विश्वमार्यम्।

— सागर तोमर

सागर तोमर

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