भूमि बचाओ
जनता ने खुद से किया,अपना सबकुछ नाश |
हमें जरूरत बना रही,चलती फिरती लाश ||
तू इसको खा नोच के,मैं इसको लूं नोच |
संसाधन को नोच लो,यही रही है सोच ||
अभिलाशायें कम करो,साफ करो आकाश |
आने वाली नस्ल को,मिलता रहे प्रकाश ||
अपनी भूमि बेच कर,बन गये हम मजदूर |
बड़ी कम्पनी कर रही,मरने को मजबूर ||
सुख की पूंजी छोड़ कर,अपना लिया कलेश |
बेवकूफ जन सोचते,है विकास पर देश ||
ये नेता जब चल बसे,लेकर कर्ज उधार |
कहेगीं इनकी आत्मा,जाकर कर्ज उतार ||
— शालिनी शर्मा
