जाते-जाते एक आवाज की जरूरत थी
शाम की दहलीज़
पगचिह्न धुँधलाए से
मन ठहर-सा गया
राहें चुप खड़ी
कदमों की आहट में
एक पुकार रही
धूप उतर चली
साँझ की नरम बाँहों में
स्मृति झिलमिलाई
सूनी गलियों में
हवा ने छूकर कहा
कुछ कहे बिना
पलकों के तट पर
रुका हुआ एक आँसू
कहानी बन गया
जाते-जाते बस
एक आवाज की चाह
दिल में रह गई
— डॉ. अशोक
