कविता

आखिर! औरत को तबायफ बनाता हैं कौन ?

उन रंगीन महफ़िलों की नुमाइश! बनके रह गई औरत ।
मिलती आज, हर गली- नुक्कड़ चौराहे पे तबायफ ।।

मैं! पूछती हुँ? आखिर! औंरत को तबायफ बनाता हैं कौन ?
उन बदनाम गलियों… बाजारों तक इन्हें ले जाता हैं कौन ?

जिस्मफरोशी के, ये धंधे आखिर! करवाता कौन ?
इन मर्दो के सिवा, कीमत इनकी लगाता हैं कौन ?

अय्याश मर्द दुनिया में सारे, मगर! हैं बदनाम तबायफ ।
इन बदजात मर्दो को ये आईना , आखिर! दिखाएगा कौन ?

बदँ कराने वाले ही गर” चलाएंगे बाजार-ए-कारोबार..।
मैं! पूछती हुँ..? आखिर! ये जिस्मे बाजार बंद कराऐगा कौन ??

— रीना सिंह गहलोत रचना

रीना सिंह गहलौत 'रचना'

कवयित्री नई दिल्ली

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