कुदरती रचना से परे क्यूँ नहीं देखते ?
रूप कितने … इक औरत के।हर आदमी क्यूँ ? फिर इक नज़र से देखता ।। देहरूपी रचना… से परे।क्यूँ? ओर
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Read Moreफ़रेब जिंदगी इक फ़साना ।सच तो है सिर्फ, मृत्यु का आना ।। अजर-अमर न कोई जहां में ।रो क़ब्र पे
Read Moreहर साल लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान आदि करते हैं। मैं उनसे कुछ
Read Moreये पृथ्वी हमें बचानी होगी ।वरना, निर्जीव हमारी कहानी होगी ।। वृक्ष वन, जल -जीव सब घटता जा रहा है
Read Moreबनी धरती अंगाराहर तरफ धधक रही ज्वालाझुलस रहा भू का अंर्तमनखो रही पृथ्वी, अपना संतुलनपर्यावरण में फैला जहरप्रदूषण का टूट
Read Moreमहिला दिवस पर खास मेरी बेटी के लिए यह रचना- मेरी नन्हीं सी , कली हो तुम जीतीं हूँ जिसके
Read Moreफ़रेब जिंदगी इक फ़साना | सच तो है सिर्फ, मृत्यु का आना || अजर-अमर न कोई जहां में | रो
Read Moreअजीब आरजू , जिंदगी की । कैसी फितरत है , ये ! रचना ।। सीख चुके , दर्द से उभर
Read Moreकट गए तब , हर रिश्तों से । हर दिल मे , जब फरेब देखा ।। रिश्तों के मायने ,
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