कविता : जिंदगी एक पहेली
अजीब आरजू , जिंदगी की । कैसी फितरत है , ये ! रचना ।। सीख चुके , दर्द से उभर
Read Moreअजीब आरजू , जिंदगी की । कैसी फितरत है , ये ! रचना ।। सीख चुके , दर्द से उभर
Read Moreकट गए तब , हर रिश्तों से । हर दिल मे , जब फरेब देखा ।। रिश्तों के मायने ,
Read Moreखुबसूरत रचना का , गुनाह ही क्या था ? सुलझी थी , वो ! मगर किसी ने समझा न था
Read Moreउन रंगीन महफिँलो की , नुमाइश बनके रह गई औरत । मिलती आज , हर गली नुक्कड़ चौराहेँ पे तबायफ
Read Moreकट गए तब , हर ..रिश्तों से । हर दिल मे , जब फरेब देखा ।। रिश्तों के मायने
Read More