कुदरती रचना से परे क्यूँ नहीं देखते ?
रूप कितने … इक औरत के।
हर आदमी क्यूँ ? फिर इक नज़र से देखता ।।
देहरूपी रचना… से परे।
क्यूँ? ओर रिश्तें नहीं देखता ।।
पढ़ी… आदमियत जात् जबसे…।
नज़र हर चेहरे में, एक अय्याश हैं दिखता ।।
भेड़िये सी नज़रें, शिकारी सी ताक लगाए ।
हर शख़्स में जैसे, एक जानवर सा दिखता ।।
सम्मान ना मर्यादा, न उम्र का लिहाज ।
क्यूँ ? हर कोई शोखियों भरी नज़रों से देखता ।।
कुदरती रचना से परे! औरत इंसान भी है।
क्यूँ? आदमी, ये नहीं … देखता ।।
— रीना सिंह गहलोत रचना
