डिफॉल्ट

कुण्डलिया

ममता की वो खान है, मानें हम संताप।
अपने निज व्यवहार से, करते हम सब पाप।।
करते हम सब पाप, सभी हम जो हैं भरते।
उसकी पीड़ा आज, देख क्यों नहीं समझते।
कहें मित्र यमराज, समझिए इतनी समता।
प्यारे पढ़ लो आप, मित्र लाचारी ममता।।९

मानो ज्ञान भंडार का, निज जीवन आयाम।
अज्ञानी बन बैठना, बदनामी तव नाम।।
बदनामी तव नाम, भलाई आखिर किसमें।
करना वो ही काम, भाव सुखदा हो जिसमें।
आप बढ़ाओ कोष, मित्र अब इतना जानो।
बाकी सबकुछ आप, सोच समझकर मानो।।१०

जिनकी होती है नहीं, स्वाभिमान पहचान।
हम सब उनको जानते, इतना होता ज्ञान।।
इतना होता ज्ञान, व्यर्थ है चर्चा करना।
होशोहवास में आप, मित्र संभलकर रहना।
दूरी रखिए आप, कहानी जो है इनकी।
क्यों उनकी पहचान, शोर है चहुँदिश जिनकी।।११

सबके नहीं नसीब में, होता माँ का प्यार।
जो इससे वंचित रहे, वही समझता सार।।
वही समझता सार, दंश ये होता भारी।
पर बेचारा आप, कहे किससे लाचारी।
कहें मित्र यमराज, जगत में ऐसे तबके।
धक्के खाते नित्य, जहाँ में रहते सबके।।१२

बनिए नहीं बिचौलिया, मिलता केवल दोष।
सहना पड़ता व्यर्थ में, कल में ढेरों रोष।।
कल में ढेरों रोष, काम जब उसका निकले।
काम बिगड़ यदि जाय, फोड़ना चाहे टकले।
कहें मित्र यमराज, बात मेरी तो सुनिए।
अच्छा होगा आप, सामने मूरख बनिए।।१३

सबसे ज्यादा आजकल, अपने लगते भार।
कलयुग का यह सार है, लगभग हर परिवार।
लगभग हर परिवार, सुनें हम यही कहानी।
सभी सुनाते आज, कथाएं आप जुबानी।
कहें मित्र यमराज, शिकायत नहीं किसी से।
सभी दुखी हैं आज, मगर हम अच्छे सबसे।।१४

अंर्तमन की पीर का, होता गहरा घाव।
आज छोड़कर कल उसे, आप दीजिए भाव।
आप दीजिए भाव, रंग चेहरे मत लाना।
नाहक उसको आज, नहीं दो पानी दाना।
इसका रौरव छंद, तोड़ देता है हर तन।
कहें मित्र यमराज, गजब होता अंर्तमन।।१५

दिखता है दृश्यमान जो, करता सबको तंग।
जो हो रहा समाज में, आज बहुत बदरंग।।
आज बहुत बदरंग, जमाना कैसा आया।
कलयुग के दौर ने, जगत को है भरमाया।।
कहें मित्र यमराज, सत्य भी खूब है बिकता।
मान लीजिए आप, झूठ ही आगे दिखता।।१६

आया मुश्किल समय है, होते सब बेहाल।
सूर्यदेव इतने कुपित, तपन हुई विकराल।।
तपन हुई विकराल, हमें भी तो समझा दो।
या लाकर चुपचाप, एक बोतल पकड़ा दो।।१७
कहें मित्र यमराज, शर्म आती है भाया।
गर्मी का यह रूप, आप से मिलने आया।।

बनते न्यायाधीश जो, होते नहीं महान।
संविधानक्ष की पालना, रखें ईश का ध्यान।।
रखें ईश का ध्यान, न्याय के जो अनुरागी।
नीति नियम सिद्धांत, बने रहते बिरहागी।
कहें मित्र यमराज, धर्म का पोषण करते।
तब जाकर कुछ लोग, योग्य तब इसके बनते।।१८

तुमको जो अच्छा लगा, किया वही हर काम।
और मुफ्त में हो गए, घर बैठे बदनाम।।
घर बैठे बदनाम, पीटते अब क्यों माथा।
करते जिन पर नाज , आज कोई ना साथा।
कहें मित्र यमराज, बुलाओ इनको उनको।
हम भी देखें आज, यहाँ जो लाए तुमको।।१९

ऐसे भी कुछ लोग हैं, नहीं आस्था ज्ञान।
कुंठा में हैं जी रहे, बनते बड़े महान।।
बनते बड़े महान, बता कर वे खुश होते।
नहीं समझते आज, उड़ेंगे इक दिन तोते।
कहें मित्र यमराज, बनो मत इनके जैसे।
ये सब हैं बेशर्म, रहेंगे बिल्कुल ऐसे।।२०

आस्था के साथ अब क्यों, खेल रहे हैं लोग।
या फिर इन सबको मिला, जन्मजात ये रोग।।
जन्मजात ये रोग, दवा अब बहुत जरूरी।
मान लीजिए आप, भले ही हो मजबूरी।
कहें मित्र यमराज, बढ़ाओ सब मिल हाथा।
तभी बचेगी लाज, सत्य जब होगी आस्था।।२१

गाना गाते बेसुरा, या फिर कोई रोग।
दुश्मन से लगने लगे, अपने सारे लोग।।
अपने सारे लोग, दुश्मनी लगे निभाने।
बिना बात के आज, बेवजह देते ताने।
कहें मित्र यमराज, व्यर्थ इनको समझाना।
रहें दंभ में चूर, बेसुरा गाते गाना।।२२

नफरत ही नफरत भरी, मानव मन में आज।
क्या होता अब जा रहा, कैसा हुआ समाज।।
कैसा हुआ समाज, राम जाने क्या होगा।
भोग रहे सब आज, नहीं जो कल तक भोगा।।
कहें मित्र यमराज, दिखाओ यार शराफत।
करो सभी से प्रेम, नहीं आपस में नफरत।।२३

*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921

Leave a Reply