गीत/नवगीत

सोने की चिड़िया

अपनी विरासत गर संभाल हम पाते
स्वार्थी तत्वों से बचाकर रख पाते
राष्ट्र धर्म जो पूरी शिद्दत से निभाते
और जयचंदों की पहचान कर पाते
आज भी हम सोने की चिड़िया कहाते

संसाधनों की अब भी कमी नही है
अकूत सम्पदा देश में भरी पड़ी है
उत्साह व अनुभव का अनोखा संगम
इसका जो चतुराई से उपयोग कर पाते
आज भी हम सोने की चिड़िया कहाते

नदियां,सागर, पहाड़ सब कुछ यहीं है
घाटी, झरने, झीलें अति लुभावनी हैं
है प्राकृतिक सुंदरता अद्वितीय हमारी
इन्हें प्रदूषण से जो बचाकर रख पाते
आज भी हम सोने की चिड़िया कहाते

सूर्य देव हम पर हैं सदा से मेहरबान
खनिज सम्पदाओं से लदी हमारी खान
भारतीय व्यंजनों की विश्व भर में शान
अपनी संस्कृति पर जो गर्व कर पाते
आज भी हम सोने की चिड़िया कहाते

दिन -प्रतिदिन प्रकृति से हम दूर हो रहे
पीढ़ी दर पीढ़ी नशे में चूर हो रहे
बस बड़ी-बड़ी बातों में मशगूल हो रहे
थोड़ा जो खुद में सुधार कर पाते
आज भी हम सोने की चिड़िया कहाते

खेत-खलिहान भी हैं भरपूर उपजाऊ
इरादे हैं मजबूत, श्रमिक गण टिकाऊ
कैसे इस धरा का मैं कर्ज चुकाऊं
निहित स्वार्थ से थोड़ा ऊपर उठ पाते
आज भी हम सोने की चिड़िया कहाते

मंदिर, मस्जिद, गिरिजा, गुरुद्वारा यहां
यमुना, गायत्री, गोपाल का सहारा यहां
श्री गंगा आरती का भव्य नजारा यहां
गीता का ज्ञान जो आत्मसात कर पाते
आज भी हम सोने की चिड़िया कहाते

सूर,कबीर,तुलसी,रसखान की धरा
चाणक्य से नीति कारों की वसुन्धरा
भरत के पराक्रम पर नाम भारत पड़ा
छद्म राजनीति से जो थोड़ा बाज आते
आज भी हम सोने की चिड़िया कहाते

श्री राम, कृष्ण, गौतम, नानक का देश
भिन्न -भिन्न भाषाएं, नित्य नये नये भेष
सहज है यहां हर किसी का समावेश
यही विशेषता जो हम कायम रख पाते
आज भी हम सोने की चिड़िया कहाते

अपनी विरासत गर संभाल हम पाते
स्वार्थी तत्वों से बचाकर रख पाते
राष्ट्र धर्म पूरी शिद्दत से जो निभाते
और जयचंदों की पहचान कर पाते
आज भी हम सोने की चिड़िया कहाते

— नवल अग्रवाल

२८ नवम्बर,२०२५

*नवल किशोर अग्रवाल

इलाहाबाद बैंक से अवकाश प्राप्त पलावा, मुम्बई

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