महिलाओं के विरुद्ध बढ़ते अपराध: आख़िर क्या है समाज का उत्तरदायित्व
१९ मार्च २०२०, शाम ५ बजे तीस हज़ारी कोर्ट से अपना काम ख़त्म करके जब अपने घर जाने हेतु मैंने मेट्रो ली और समाचार देखने के लिए मोबाइल हाथ में लिया, तो एक दृश्य समाचार चैनल में दिखायी दिया- “आख़िर मेरे बेटे को फाँसी देकर किसी को क्या मिलेगा, मेरा बेटा निर्दोष है उसे छोड़ दो” माननीय सुप्रीम कोर्ट के द्वारा निर्भया के दोषियों को फाँसी की सज़ा बरकरार रखने पर आरोपी मुकेश सिंह की माँ बिलख बिलख कर रोते हुए, संवाददाताओं को कह रही थी। दूसरी और निर्भया की माँ भी रो रही थी, क्योंकि निर्भया के हत्यारों को अभी फाँसी दी नहीं गई थी और आरोपियों द्वारा हर संभव प्रयास किया जा रहा था कि इस फाँसी को टाला जा सके। इस बीच २० मार्च २०२० को, चारों आरोपियों को फाँसी दे दी गई। निर्भया को न्याय मिला।
१६ दिसम्बर २०१२ की वो भयानक रात। निर्भया के जीवन की अंतिम रात थी। उसने सोचा भी नहीं होगा कि दिल्ली जैसे व्यस्त शहर में वो जिस बस में देर रात सफ़र कर रही है उसमे २ आँख एक मुँह वाले “इंसान” नहीं बल्कि “काल” रूप में उसके सामने बैठे हैं। उसके साथ उस रात ब्लात्कार का वो भयावह व घृणित कृत्य, उसकी मौत का कारण बन गया, लेकिन उसकी मौत ने देश में लड़कियों की वास्तविक स्थिति पर एक प्रश्न चिह्न छोड़ दिया। ऐसी बात भी नहीं है की निर्भया काँड के बाद ऐसी घटनाओं पर कोई रोक लगी हो। उसके बाद में लखनऊ और भोपाल में २ लड़कियों को ब्लात्कार के बाद ज़िंदा जलाने की घटनाएँ भी अख़बारों की सुर्खियों का हिस्सा बनी थीं। इस घटना और इसके निपटारण के बाद महिला सुरक्षा के अध्याय में एक प्रश्न जरूर खड़ा हो गया की २१ वीं सदी में जहाँ सरकारों द्वारा बड़ी बड़ी उपलब्धियाँ गिनायी जाती हैं वहाँ महिलाओं की सुरक्षा व्यवस्था आज भी संदेह के दायरे में बनी हुई है।
लड़कियों/महिलाओं के प्रति हिंसा के मामलों में भारत १८१ देशों में १३१वें स्थान पर है। यह आंकड़ा यह दर्शाता है कि भारत में यौन हिंसा के अपराधों में प्रति वर्ष वृद्धि ही हो रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार वर्ष २०१२ में जहाँ देश में ब्लात्कार के २४९२३ मामले दर्ज किए गए वहीं २०२३ में २९६७० मामले दर्ज किए गए। पिछले वर्ष यानी २०२५ में ३०५४५ मामले दर्ज किए गए। महिलाओं के विरुद्ध अपराध जिनमे केवल यौन अपराध ही नहीं, शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना भी अलग स्थान लिए हैं, के लाखों मामले विभिन्न अदालतों में लंबित हैं। जनसंख्या के अनुपात में लगातार विभिन्न प्रकार के अपराधों में वृद्धि इस बात का प्रमाण है कि आज के युग में जहाँ शिक्षा और तकनीक के क्षेत्र में क्रांति का वातावरण है वहीं दूसरी और सामाजिक बदलाव में जीरो परिवर्तन देखने में आता है।
क्या कारण हैं ऐसे अपराधों की बढ़ोतरी के लिए:
महिलाओं के विरुद्ध अपराध आज ही नहीं अपितु कालांतर से होते रहे हैं। कारण कुछ भी रहे हों किंतु ऐसे अपराधों के लिए किसी एक वर्ग को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। चाहे राजनीति हो चाहे प्रशासनिक संस्थाएं अथवा न्यायालय, सभी किन्हीं नियमों व विनियमों के अंतर्गत काम करते हैं। इसलिए केवल एक संस्था पर ही पूरा समाज आश्रित नहीं रह सकता। सरकार अपनी तरफ़ से क़ानून बनाती है। पुलिस व प्रशासनिक संस्थाए अपना कार्य करती हैं। न्यायालय उचित सामग्री, गवाहों के बयान और प्रमाणों के आधार पर दंड तय करते हैं। किंतु ऐसा क्या है कि अपराधी अपराध करने से नहीं चूकते। क्या कहें? क्या कानून का डर समाप्त हो चुका है या कोई अन्य कारण भी हैं जो अपराधियों के हौंसले बढ़ाने में योगदान करते हैं? अक्सर आपने सुना होगा कि जनता को अक्सर यही शिकायत रहती है कि अपराधों की रोकथाम के लिए सरकारें असफल हैं। प्रशासन का रवैया उदासीन है। लेकिन यह कितना सच है? इस बात में कोई संदेह नहीं कि अपराधों की रोकथाम के लिए कठोर से कठोर कानून व उनके अनुपालन की आवश्यकता है। किंतु एक पक्ष ऐसा भी है जिस पर हमने कभी ध्यान नहीं दिया। वो है समाज की अपनी सोच।
आख़िर सामाजिक सोच और जागरूकता कितनी आवश्यक है:
कचहरी की नौकरी में जहाँ तक मैने अनुभव लिया है वो यह है कि यहाँ माननीय न्यायाधीश दिन रात मामलों के निपटारों के लिये जी तोड़ मेहनत करते हैं। पूरा सिस्टम दिन प्रतिदिन लंबित मामलों के निपटारों के लिए प्रयासरत है लेकिन मामले बढ़ रहे हैं। जहाँ तक मैंने अनुभव किया है यहाँ समाज की अपनी भूमिका ज़्यादा महत्वपूर्ण है। एक बहुत ही स्टीक उदाहरण देता हूँ। यहाँ जितने भी आपराधिक मामले हैं उसमे अपराधियों के विरुद्ध पूरा समाज खड़ा होता है, मगर समाज का दृष्टिकोण क्या वास्तव में व्यावहारिक है? मेरे विचार में नहीं। जैसा कि हम आए दिन देखते हैं कि अगर समाज में कहीं कोई आपराधिक गतिविधि होती है, विशेष रूप के महिलाओं के विरुद्ध कोई अपराध घटित होता है तो पूरा मीडिया और सामाजिक संगठन जोर शोर से अपराधी के विरुद्ध कठोर से कठोर कार्यवाही की मांग करते हैं, मगर यहाँ भी मुझे समाज की एक विकृत सोच नज़र आती है। यह जितने भी लोग अपराधी के विरुद्ध कार्यवाही की माँग करते हैं यह माँग तभी तक रहती है जब तक अपराधी कोई “अन्य” व्यक्ति है। यही लोग, यही समाज, यही संगठन तब मुँह सिल लेते हैं जब अपराध करने वाला “अपने परिवार” से हो। ऐसा क्यों होता है की हम दूसरों के लिए फाँसी की माँग बड़ी आसानी से करते हैं लेकिन जब अपराधी अपने ही घर का सदस्य हो तो हम ही उसकी “जमानत” करवाने के लिए सबसे आगे होते हैं।
आख़िर न्याय का मानक क्या है:
जिस अपराध के लिए यह समाज फाँसी की माँग करता है उसी अपराध के लिए ख़ुद जमानत देने सबसे आगे होता है। अपराधी को बचाने के लिए उस समय हज़ार विकल्प तलाशे जाते हैं जब अपराधी अपने घर का सदस्य हो। तब न्याय की परिभाषा बदल जाती है। ऊपर प्रारंभ में मैंने निर्भया के अपराधी की माँ का जो व्यवहार दिखाया वो उसी मानसिकता को दिखता है जिसमे पीड़ित का दुःख असहनीय होता है किंतु अपराधी के साथ खड़े होने वाले उसके अपने ही खड़े होते हैं, वो अपने जो किसी दूसरे के विरुद्ध सड़कों पर कैंडल मार्च करते नहीं थकते मगर अपने बाप भाई बेटे को बचाने के लिए कोर्ट के चक्कर काटते नहीं थकते। ऐसे में न्यायालय के सामने अनगिनत चुनौतियाँ होती हैं। जहाँ समाज के विभिन वर्गों का प्रेशर जिसमे गंभीर मामलों को जल्द से जल्द निपटारा करने हेतु निर्देश दिए जाते हैं वहीं अपराधी के परिवार वाले भी न्यायिक सहायता प्राप्त करते हुए अपने अपराधी सदस्य को बचाने के लिए हर उपाय करते हैं जिसमे कई बार देखने में आता है की गवाहियाँ भी होनी मुश्किल हो जाती हैं। अपराधियों के पक्ष में तर्क रखे जाते हैं।
“ज़रा सोचिए। हमारा समाज कितना सकारात्मक होता है जब देखता है कि लाखों की संख्या में सामाजिक वर्ग, और सामाजिक संस्थाएं समाज में महिलाओं के विरुद्ध हो रहे अपराधों के विरुद्ध आंदोलन करते हैं, क़ानून सख़्त से सख़्त बनाने पर ज़ोर देते हैं तथा क़ानून के अनुपालन के लिए भी जी तोड़ प्रतास करते हैं, लेकिन क्या किसी ने इसका दूसरा पहलू देखने का प्रयास किया? आश्चर्य होता है कि यह जितने भी लोग सामाजिक आंदोलनों का हिस्सा बनते हैं यह तभी तक उस आंदोलन में होते हैं जब तक कि अपराध करने वाला कोई “अन्य” है। इनमे से एक भी ऐसा नहीं होगा जो उस मामले में भी आगे आयेगा जब अपराध करने वाला उनके ही घर का कोई सदस्य होगा। कहाँ चली जाती है तब न्याय की परिभाषा?”
अगर ध्यान से विचार किया जाये तो हमारे समाज में प्रत्येक अपराधी को सुरक्षा देने वाला पहला और आख़िरी गढ़ उसका अपना परिवार होता है। ज़रा विचार कीजिए न्यायालय , सरकारें और प्रशासन कितने भी प्रयास कर लें आपराधिक मामले तो निपट जाते हैं किंतु अपराधियों के हौंसले नये अपराधों के लिए कभी कम नहीं होते क्यूँकि हमारे समाज में अपने ही घर में पल रहे अपराधी को कभी ग़लत नहीं कहा जाता बल्कि उसकी ज़मानत के लिए हर संभव प्रयास किया जाता है।
बात विचार करने की है कि जब समाज का अधिकतर नागरिक अपराध और अपराधी के ख़त्म होने की बात करते हैं तो ऐसा क्यों होता है कि वही समाज अपने घर पल रहे अपराधी की जमानत के लिए एड़ियाँ रगड़ देते हैं? कल्पना कीजिए ऐसे समाज की जहाँ प्रत्येक नागरिक अपने घर में पल रहे अपराधी की जमानत ना करवाये तो क्या होगा? अपराधियों के ९९% हौंसले ख़त्म हो जाएँगे और अपराध करने से पहले सोचेंगे। लेकिन वर्तमान में बिल्कुल उल्टा है। वो सभी लोग जो अपराधियों के लिए कड़ी से कड़ी सज़ा की माँग करते हैं वही अपने घर में सदस्य अपराधियों को संरक्षण देते हैं जिस वजह से अपराध कम नहीं होते। क़ानून व्यवस्था और न्यायालय को दोष देना कितना आसान है किंतु हमे इसकी जड़ को समझना होगा। कप्पन कीजिए ऐसे समाज की जहाँ प्रत्येक व्यक्ति ग़लत को ग़लत कहने की हिम्मत रखता हो। अपने घर में पल रहे अपराधी के विरुद्ध क़ानूनी कार्यवाही में साथ देने का साहस रखता हो। ऐसे में अपराध स्वयं शून्य ना सही किंतु काफ़ी सीमा तक कम हो जाएँगे क्यूँकि अपराधियों को सारा साहस घर परिवार से ही मिलता है।
महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में कमी केवल तभी आ सकती है जब समाज जागरूक हो और हर ग़लत काम को ग़लत कहने का साहस रखता हो चाहे वो ग़लत करने वाला घर का ही सदस्य क्यों ना हो। अपराधियों को पहला हौंसला घर से ही मिलता है। मैं यह नहीं कहता कि प्रत्येक अपराधी सच में अपराधी हो किंतु ऐसा भी नहीं हो सकता की १००% अपराधी सही हों। जबकि आंकड़ों की माने तो हमारे देश की प्रत्येक अदालतों में जितने भी आपराधिक मामले हैं उनमे सभी मामलों में जमानत के लिए घर वाले ही आगे आते हैं। जबकि यह जानते हुए भी कि अपराधी ने एक घृणित कार्य किया है उसको जमानत के लिए प्रयास करना समाज की दोगली मानसिकता को दर्शाता है जिसके समाज अन्य अपराधी के लिए कड़ी से कड़ी सजा की आशा रखता है किंतु वहीं जब अपराधी अपने ही घर से हो तो उसके बचाव के लिए हजारों उपाय सोचे जाते हैं। महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की रोकथाम के लिए सामाजिक दृष्टिकोण में बदलाव की आवश्यकता है। अन्यथा यह दिखावटी आंदोलन केवल एक औपचारिकता बन कर रह जायेंगे।
— महेश कुमार माटा
