राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य
देश भर में बीजेपी का दबदबा और बढ़ गया है, जबकि विपक्ष और कमजोर हुआ है। चार राज्यों व एक केन्द्र शासित प्रदेश के चुनाव परिणाम हैरान करने वाले हैं। खासकर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के परिणाम ऐतिहासिक रहे, जिसका असर राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य पर पड़ेगा ?
चुनाव नतीजे सामने हैं और संदेश साफ है। जनता ने अपना फैसला सुना दिया है। चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी ने न सिर्फ अपनी जमीन बचाई है, बल्कि नए इलाकों में भी परचम लहराया है। विपक्ष के हाथ से कई गढ़ फिसल गए हैं।
सबसे बड़ा उलटफेर बंगाल में हुआ। काउंटिंग शुरू होने से पहले तक सभी के ध्यान का केंद्र बंगाल था। एक तो त्रिकोणीय संघर्ष, ऊपर से हर सीट पर कांटे की टक्कर का दावा। लेकिन नतीजों ने सारे कयास पलट दिए। जनता ने स्पष्ट जनादेश दिया है। बंगाल का नतीजा सिर्फ एक राज्य की सत्ता परिवर्तन नहीं है। यह राष्ट्रीय राजनीति के लिए संदेश है कि पुराने समीकरणों के भरोसे अब चुनाव नहीं जीते जाते।
तमिलनाडु ने भी इतिहास रच दिया। द्रविड़ राजनीति के इस गढ़ में आए नतीजे बता रहे हैं कि दक्षिण का मतदाता भी अब राष्ट्रीय मुद्दों और विकास के नाम पर वोट कर रहा है। क्षेत्रीय दलों की सियासत के लिए यह सबसे बड़ा सबक है, अब कोरे आश्वासन या चुनाव जीतने के लिए फैलाया गया झूठ नहीं टिक पाएगा।
यह जनादेश तीन बातें साफ करता है।
पहला: जनता ने प्रधानमंत्री के चेहरे और केंद्र की नीतियों पर भरोसा जताया है। कल्याणकारी योजनाओं का लाभ जमीन तक पहुंचा है। जिनके दिमाग पर विरोध की पट्टी बंधी हुई है उन्हें देश में हो रहा विकास दिखाई नहीं दे रहा है। जागरूक जनता इन्ही बातों से चिढ़ जाती है।
दूसरा: विपक्ष का नकारात्मक अभियान फेल हुआ है। सिर्फ मोदी-विरोध के नाम पर वोट नहीं मिलता। विपक्षी दल मोदी विरोध में यह भी भूल जाते हैं कि इसमें देश विरोध भी किया जा रहा है। जनता विकल्प चाहती है, कोरा विरोध नहीं।
तीसरा: चुनाव अब 24×7 चलने वाली प्रक्रिया है। संगठन, बूथ मैनेजमेंट और नैरेटिव सेट करने में जो आगे रहेगा, वही जीतेगा, जो दल चौबीसों घंटे चुनाव मोड़ में रहेगा उसे हराना आसान नहीं है।
विपक्ष के लिए यह सबसे मुश्किल दौर है। राज्यों में सिमटता जनाधार, नेतृत्व का संकट और आपसी खींचतान – इन तीन मोर्चों पर उसे लड़ना होगा। अगर अब भी आत्ममंथन नहीं हुआ तो 2027 की राह और कठिन हो जाएगी। लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष जरूरी है, लेकिन वह मजबूती जमीन से आती है, ट्वीट से नहीं। आज का वोटर जागरूक हो गया है जो कि “देश प्रथम” को ध्यान में रख कर वोट करता है और झूठे नैरेटिव से नफरत करता है। वोटर ही पक्ष विपक्ष तैयार करता है कोई राजनीतिक दल नहीं।
आगे की राह भाजपा के लिए भी आसान नहीं। जनता ने उम्मीदों का पहाड़ लाद दिया है। महंगाई, रोजगार और किसान के मुद्दे पर अब डिलीवरी देनी होगी। जनादेश अहंकार के लिए नहीं, जवाबदेही के लिए है। बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में मिला समर्थन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती होगी।
कुल मिलाकर जनता ने चौंका दिया है। उसने बता दिया कि वह जाति, धर्म और परिवार से ऊपर उठकर सोचती है। वह काम देखती है, नीयत देखती है और नतीजा देती है। जो इस संदेश को समझ गया, वही कल की राजनीति का सितारा होगा। बाकी सब इतिहास बन जाएंगे।
चुनाव प्रक्रिया और नतीजों पर सवाल खड़े करना वोटर का अपमान है, इतना ही नहीं चुनाव हारने वाले दल और उनके नेता अपने उन बूथ एजेंटों पर भी सवाल खड़े कर रहे हैं, जिन्होंने दिन भर अपनी निगरानी में प्रत्येक बूथ पर चुनाव संपन्न कराया है और अंत में मशीनों को सील करवा कर उन पर अपनी संतुष्टि के साथ हस्ताक्षर किए थे।
इसके साथ साथ ही चुनाव प्रक्रिया में लगे पूरे सरकारी तंत्र और अधिकारियों को भी कटघरे में खड़ा करते हुए उनकी की विश्वस्नीयता पर प्रश्नचिन्ह लगाने का काम किया जा रहा है ? — हरेन्द्र
— संकलित
