जनादेश के बाद भी असहमति : ममता की रणनीति या जिद?
पश्चिम बंगाल में 2026 विधानसभा चुनाव के नतीजों ने न केवल 15 साल पुरानी तृणमूल कांग्रेस की सत्ता का अंत किया, बल्कि गंभीर संवैधानिक टकराव की भूमिका भी बना दी है। भाजपा ने 293 सीटों के नतीजों के अनुसार 294 सदस्यीय सदन में 207 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत पाया, जबकि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सिर्फ 80 सीटों पर सिमट गई। ममता बनर्जी ने परिणामों को ‘साजिश’ और ‘जनादेश की लूट’ बताते हुए इस्तीफा देने से इनकार कर दिया। उनका बयान “मैं हारी नहीं, इसलिए राजभवन नहीं जाऊंगी” बंगाल की राजनीति को नए मोड़ पर ले गया है। ममता बनर्जी खुद भवानीपुर सीट पर शुभेंदु अधिकारी से हारी हैं। 92.93% के उच्च मतदान के बावजूद उनका इनकार लोकतंत्र की मूल भावना—जनता के निर्णय—को चुनौती देता है। यह हालात राज्य में अस्थिरता, हिंसा और प्रशासनिक संकट की आशंका बढ़ा रहे हैं।
ममता बनर्जी का रुख चुनावी नतीजों को सीधी चुनौती देता है—यह हार स्वीकार न करने का संकेत है। उन्होंने 100 से अधिक सीटों में धांधली, चुनाव आयोग पर पक्षपात और अपनी नैतिक जीत का दावा किया। ममता ने कहा कि असली लड़ाई भाजपा नहीं, बल्कि चुनाव आयोग से थी। हालांकि, आयोग ने पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बताते हुए वोटर लिस्ट संशोधन सहित हर कदम का बचाव किया। ममता का ‘राजभवन नहीं जाऊंगी’ बयान न केवल राज्यपाल के संवैधानिक अधिकारों की अवमानना है, बल्कि शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण की लोकतांत्रिक परंपरा को भी आघात पहुंचाता है। जब जनता स्पष्ट जनादेश दे चुकी हो, तब सत्ता से चिपके रहना लोकतंत्र की भावना के विपरीत है। बंगाल में पहले से मौजूद ध्रुवीकरण और पोस्ट-पोल हिंसा इस टकराव से और तीव्र हो सकती है।
संवैधानिक प्रावधान इस विवाद के केंद्र में हैं। अनुच्छेद 164(1) के अनुसार मुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल राज्यपाल की ‘प्रसन्नता’ पर पद धारण करते हैं। बहुमत खोने पर राज्यपाल इस्तीफा मांग सकते हैं या फ्लोर टेस्ट करवा सकते हैं। एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकार की विश्वसनीयता का परीक्षण सदन के फ्लोर पर ही होगा, न कि गवर्नर की निजी राय पर। यदि ममता इस्तीफा नहीं देतीं, तो राज्यपाल विशेष सत्र बुलाकर फ्लोर टेस्ट का आदेश दे सकते हैं। 207 बनाम 80 के आंकड़ों में फ्लोर टेस्ट में टीएमसी के लिए बहुमत साबित करना असंभव है। इसके बाद मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना या बर्खास्त होना पड़ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, राज्यपाल का यह अधिकार स्पष्ट है और इसे मनमानी नहीं कहा जाएगा।
यदि ममता फ्लोर टेस्ट से बचने या सदन की कार्यवाही से लगातार इनकार करती हैं, तो राज्यपाल के पास बर्खास्तगी और अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लागू करने का संवैधानिक विकल्प भी उपलब्ध हो जाता है। कई पूर्व सॉलिसिटर जनरल और संवैधानिक विशेषज्ञ मानते हैं कि बहुमत खोकर भी सत्ता में बने रहना संवैधानिक तंत्र के पूर्ण विफल होने का स्पष्ट संकेत है। इतिहास में महाराष्ट्र, कर्नाटक और अन्य राज्यों में ऐसी परिस्थितियां कई बार सामने आई हैं, जहां राज्यपाल ने फ्लोर टेस्ट अनिवार्य कराया या सरकार को बर्खास्त किया। ममता के मामले में भी यही स्थापित संवैधानिक प्रक्रिया अपनाई जा सकती है, ताकि लोकतंत्र और सुशासन की रक्षा प्रभावी रूप से सुनिश्चित हो सके।
इस टकराव के राजनीतिक और सामाजिक आयाम अत्यंत गहरे और व्यापक हैं। ममता ने इंडिया गठबंधन से समर्थन मांगा और केंद्र पर गंभीर आरोप लगाए हैं। वहीं, भाजपा नई सरकार बनाने की सक्रिय और निर्णायक तैयारी में है। यह बदलाव 1937 के बाद बंगाल में पहली दक्षिणपंथी सरकार के उदय का संकेत है। टीएमसी शासन के दौरान भ्रष्टाचार, संदेशखाली जैसी घटनाएं, आरजी कर कांड, हिंसा और प्रशासनिक लापरवाही के आरोपों ने मतदाताओं को भाजपा की ओर निर्णायक रूप से मोड़ा। ममता का इनकार न केवल सत्ता के लोभ और व्यक्तिवाद को उजागर करता है, बल्कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण की परंपरा को भी गंभीर चुनौती देता है। पोस्ट-पोल तनाव और कार्यालय तोड़फोड़ की बढ़ती घटनाएं स्थिति को और अधिक जटिल बना रही हैं।
संभावित परिणाम और चुनौतियां अनेक, जटिल और दूरगामी हैं। राज्यपाल यदि शीघ्र और निर्णायक कार्रवाई करते हैं तो बंगाल में अल्पकालिक राष्ट्रपति शासन लागू हो सकता है, जिसके बाद नई सरकार का गठन संभव होगा। लेकिन इससे कानून-व्यवस्था बिगड़ने और व्यापक विरोध प्रदर्शनों के उभरने की आशंका और प्रबल होगी। दूसरी ओर, यदि ममता अदालत का रुख करती हैं, तो सुप्रीम कोर्ट बोम्मई फैसले के आधार पर त्वरित फ्लोर टेस्ट का आदेश दे सकता है। यह पूरा प्रकरण भारत की संघीय व्यवस्था की वास्तविक मजबूती और संतुलन की गंभीर परीक्षा भी है। केंद्र-राज्य संबंधों में संतुलन बनाए रखना और लोकतांत्रिक मूल्यों की प्रभावी रक्षा करना अत्यंत आवश्यक और अनिवार्य है।
जब संस्थाएं और जनादेश आमने-सामने खड़े हों, तब लोकतंत्र की असली कसौटी सामने आती है—बंगाल आज उसी मोड़ पर है। जनादेश सर्वोपरि होता है और हर नेता को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर उठकर उसे स्वीकार करना चाहिए—यही सच्ची और परिपक्व लोकतांत्रिक परंपरा है। ममता बनर्जी को अब सदन में बहुमत साबित करने का अवसर मिलना चाहिए या शांतिपूर्वक सत्ता हस्तांतरण करना चाहिए। राज्यपाल, चुनाव आयोग और न्यायपालिका संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप समाधान निकालेंगे। इससे बंगाल में स्थिर और प्रभावी सरकार बनेगी तथा विकास की नई राह खुलेगी। यह टकराव ममता बनाम राज्यपाल से आगे बढ़कर लोकतंत्र बनाम व्यक्तिवाद का व्यापक प्रश्न बन गया है। शांतिपूर्ण और संवैधानिक समाधान ही बंगाल की जनता की सर्वोच्च अपेक्षा है।
— प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
