गज़ल
वो तो हमें खुद से जुदा बताए बैठे हैं
हम उन्हें दिल का खुदा बनाए बैठे हैं।
वो मिलें या न मिलें, है उनकी अपनी मर्ज़ी
हम तो खुद को ही उन्हीं में समाए बैठे हैं।
वो कहते हैं कि हमसे नहीं कोई नाता
फिर भी मेरी राहों में नज़रें बिछाए बैठे हैं।
वो हमें दूर से हर रोज़ निहारा करते हैं
हम जो देखें उन्हें, तो नज़रें चुराए बैठे हैं।
अपनी चाहत से चाहे वो जिसे भी चाहें
हम तो दिल में उन्हें अपना बनाए बैठे हैं।
दूर जाएँ वो अगर हमसे, तो कोई फ़र्क नहीं
हम तो हर ज़र्रे में उनको ही बसाए बैठे हैं।
‘शैलेश’ को वो मिलें, न मिलें—पता नहीं
पर दिल से तो उन्हें हम अपनाए बैठे हैं।
— डॉ. शैलेश शुक्ला
