कागज़ की कश्ती
कागज़ की कश्ती
भीगी नदियों पर चलती है
बालपन की हँसी में
समय तैरता जाता है
छोटे से हाथों की दुनिया
बड़ी उम्मीदें समेटे हुए
पानी की हर लहर में
एक नया सपना जन्म लेता है
बरसात की बूंदों में
यादें बहती रहती हैं
मिट्टी की खुशबू के साथ
दिल भीगता जाता है
नदी के किनारे बैठा बचपन
आँखों में चमक लिए
हर लहर को चुनौती देता
अपनी छोटी नाव से
हवा भी धीरे से छूती है
कागज़ की उस दुनिया को
जहाँ असंभव कुछ नहीं
सब कुछ सरल सा लगता है
पर वक्त की एक लहर
कश्ती को दूर ले जाती है
और बचपन वहीं रह जाता है
एक मीठी याद बनकर
— डॉ. अशोक
