कहो ना…
क्यों प्रतीत होता है ऐसा,
कि वह अशरीरी
होकर भी सर्वत्र है।
प्रातः की उन
अर्द्ध-उन्मीलित पलकों में,
धूमिल सुगन्धित समीर के
उन झोंकों में,
जो देह को नहीं,
अंतर्मन को स्पर्श कर जाते हैं।
अकारण ही…
जब कोई
स्वयं को रिक्तता में पाता है,
तब एक अदृश्य स्पर्श
मौन भाव से उसे
आवेष्टित कर लेता है,
जैसे कोई परम आत्मीय
समीप होकर भी,
दृश्यमान नहीं होना चाहता।
विस्मयकारी है न?
मौन की पराकाष्ठा में भी,
स्पंदन उस अनिवर्चनीय की
ओर मुड़ जाते हैं।
जब शब्द निद्रामग्न हो जाते हैं,
तब अंतस की गहराइयों से
कोई मृदु स्वर में उसे पुकारता है,
और चित्त व्याकुल हो उठता है
इस संशय में कि
वह ‘अन्य’ नहीं,
अपितु निज के ही भीतर
अधिष्ठित है।
कहो ना …
यह आसक्ति है,
वंदना है,
या पूर्वजन्म की
कोई अपूर्ण स्मृति?
या फिर…समस्त
चराचर जगत,
इसी प्रकार किसी
गुढ़ रहस्य केअदृश्य
पाश में आबद्ध है?
क्या तुम्हारा अपना
हृदय भी स्वयं से
यही प्रश्न करता है?
क्या तुम भी उसी
व्याकुलता से निज के भीतर,
किसी क़ो खोजते हो?
कहो ना!!
कहो ना…
— सविता सिंह मीरा
