राजनीति

समग्र विकास की नीतियाँ बनाने के लिए बहुआयामी होनी चाहिए भारतीय जनगणना

भारत जैसे विशाल, विविधतापूर्ण और जनसंख्या बहुल देश में नीति निर्माण की सबसे महत्वपूर्ण आधारशिला विश्वसनीय और विस्तृत आँकड़े होते हैं। किसी भी लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने नागरिकों की वास्तविक स्थिति, आवश्यकताओं, क्षमताओं और चुनौतियों को सटीक रूप से समझ सके। इसी उद्देश्य से जनगणना  को एक अत्यंत महत्वपूर्ण राष्ट्रीय अभ्यास माना जाता है। परंतु वर्तमान समय की जटिल सामाजिक–आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो गया है कि क्या पारंपरिक जनगणना के स्वरूप में उपलब्ध आँकड़े समग्र और प्रभावी नीति निर्माण के लिए पर्याप्त हैं, या फिर भारतीय जनगणना को अधिक बहुआयामी, विस्तृत और तकनीकी रूप से उन्नत बनाए जाने की आवश्यकता है। स्पष्ट रूप से यह कहा जा सकता है कि यदि भारत को समावेशी, पारदर्शी और प्रभावी विकास नीतियाँ बनानी हैं, तो जनगणना को केवल जनसंख्या की गणना तक सीमित न रखकर उसे बहुआयामी डेटा संग्रहण की एक व्यापक प्रक्रिया में परिवर्तित करना होगा।

भारत में अंतिम पूर्ण जनगणना वर्ष 2011 में आयोजित की गई थी, जिसमें देश की कुल जनसंख्या 121 करोड़ दर्ज की गई थी। इसके बाद वर्ष 2021 की जनगणना कोविड महामारी के कारण स्थगित हो गई, जिससे वर्तमान समय में नीति निर्माण के लिए अद्यतन जनसंख्या आँकड़ों की कमी महसूस की जा रही है। यह स्थिति इस तथ्य को और अधिक स्पष्ट करती है कि न केवल जनगणना का समय पर आयोजन आवश्यक है, बल्कि उसका स्वरूप भी समय के अनुरूप विकसित किया जाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र के जनसंख्या प्रभाग सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ यह मानती हैं कि आधुनिक जनगणना केवल जनसंख्या की गणना नहीं, बल्कि सामाजिक–आर्थिक विशेषताओं के विस्तृत अध्ययन का माध्यम होनी चाहिए, जिससे सरकारें सटीक और लक्षित नीतियाँ बना सकें।

पारंपरिक जनगणना में मुख्य रूप से आयु, लिंग, साक्षरता, आवास और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े सीमित आँकड़े एकत्रित किए जाते रहे हैं। हालांकि ये आँकड़े महत्वपूर्ण हैं, परंतु वर्तमान समय की जटिलताओं—जैसे बेरोजगारी, आय असमानता, डिजिटल विभाजन, सामाजिक न्याय, और लक्षित कल्याणकारी योजनाओं के प्रभाव—को समझने के लिए अधिक विस्तृत और सूक्ष्म जानकारी की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए, यदि सरकार को यह जानना हो कि किस क्षेत्र में कितने लोग वास्तव में बेरोजगार हैं, या किस सामाजिक वर्ग तक सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं पहुँच पा रहा है, तो इसके लिए पारंपरिक आँकड़ों से अधिक विस्तृत डेटा की आवश्यकता होगी।

इसी संदर्भ में यह सुझाव अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है कि भारतीय जनगणना में प्रत्येक व्यक्ति और परिवार के स्तर पर बहुआयामी जानकारी एकत्रित की जाए। इसमें आधार के साथ परिवार के सदस्यों की मैपिंग, आयु, शिक्षा का स्तर, रोजगार की स्थिति, आय के स्रोत, सामाजिक वर्ग और जातिगत विवरण, परिवार को प्राप्त आरक्षण का लाभ, विभिन्न सरकारी योजनाओं—जैसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली, स्वास्थ्य बीमा, पेंशन और आवास योजनाओं—का वास्तविक लाभ, तथा परिवार की चल और अचल संपत्ति का विवरण शामिल किया जा सकता है। यदि इस प्रकार का समेकित डेटा उपलब्ध होता है, तो सरकारों को यह समझने में अत्यंत सुविधा होगी कि किस क्षेत्र और किस वर्ग को किस प्रकार की सहायता की आवश्यकता है।

नीति निर्माण के दृष्टिकोण से यह बहुआयामी डेटा अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी जिले में बड़ी संख्या में ऐसे परिवार पाए जाते हैं जिनकी आय एक निश्चित स्तर से नीचे है और जिनके पास स्थायी रोजगार नहीं है, तो वहाँ कौशल विकास, रोजगार सृजन और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को प्राथमिकता दी जा सकती है। इसी प्रकार, यदि किसी विशेष सामाजिक वर्ग या क्षेत्र में शिक्षा का स्तर कम है, तो वहाँ विद्यालयों, शिक्षकों और छात्रवृत्ति योजनाओं का विस्तार किया जा सकता है। इस प्रकार जनगणना केवल आंकड़ों का संग्रह न रहकर, लक्षित और प्रभावी नीति निर्माण का आधार बन सकती है।

भ्रष्टाचार निवारण के संदर्भ में भी बहुआयामी जनगणना अत्यंत प्रभावी उपकरण बन सकती है। वर्तमान में अनेक बार यह देखने को मिलता है कि सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तविक पात्र लोगों तक नहीं पहुँच पाता, जबकि अपात्र लोग लाभ उठा लेते हैं। यदि प्रत्येक परिवार का विस्तृत सामाजिक–आर्थिक प्रोफाइल उपलब्ध हो और उसे आधार आधारित डिजिटल प्रणाली से जोड़ा जाए, तो लाभार्थियों की पहचान अधिक सटीक और पारदर्शी हो सकती है। इससे ‘डुप्लीकेट’ या ‘फर्जी’ लाभार्थियों की समस्या को काफी हद तक समाप्त किया जा सकता है और संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित किया जा सकता है।

राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी जनगणना के विस्तृत आँकड़े महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। किसी भी देश के लिए यह आवश्यक होता है कि उसे अपने नागरिकों की संख्या, उनके निवास स्थान, प्रवासन की प्रवृत्तियों और जनसंख्या के वितरण की सटीक जानकारी हो। यदि जनगणना में प्रवासी श्रमिकों, अस्थायी निवासियों और शहरी–ग्रामीण स्थानांतरण के पैटर्न का विस्तृत विवरण शामिल किया जाए, तो इससे आंतरिक सुरक्षा, आपदा प्रबंधन और शहरी नियोजन में महत्वपूर्ण सहायता मिल सकती है। कोविड महामारी के दौरान बड़े पैमाने पर हुए प्रवासी श्रमिकों के पलायन ने यह स्पष्ट कर दिया था कि देश के पास इस वर्ग से संबंधित अद्यतन और सटीक डेटा का अभाव है, जिसके कारण नीति निर्माण और राहत कार्यों में कठिनाई उत्पन्न हुई।

गरीबी उन्मूलन की दिशा में भी बहुआयामी जनगणना अत्यंत उपयोगी हो सकती है। यदि सरकार के पास यह स्पष्ट जानकारी हो कि कौन–कौन से परिवार किन–किन मानकों पर वंचित हैं—जैसे आय, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण आदि—तो वह बहुआयामी गरीबी के आधार पर लक्षित योजनाएँ बना सकती है। नीति आयोग की रिपोर्टों में भी यह बात सामने आई है कि भारत में बहुआयामी गरीबी में उल्लेखनीय कमी आई है, परंतु इसके लिए सटीक और अद्यतन डेटा का होना अत्यंत आवश्यक है, ताकि प्रगति को मापा जा सके और शेष चुनौतियों की पहचान की जा सके।

हालांकि इस प्रकार की विस्तृत जनगणना के साथ कुछ चुनौतियाँ और चिंताएँ भी जुड़ी हुई हैं, जिन पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक है। सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा निजता  डेटा सुरक्षा का है। जब सरकार नागरिकों से उनके आय, संपत्ति, सामाजिक स्थिति और अन्य व्यक्तिगत जानकारी एकत्रित करती है, तो यह सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है कि इस डेटा का दुरुपयोग न हो और उसे सुरक्षित रखा जाए। इसके लिए मजबूत कानूनी ढाँचा, पारदर्शी प्रक्रियाएँ और तकनीकी सुरक्षा उपाय अनिवार्य हैं।

दूसरी चुनौती इस प्रकार के व्यापक डेटा संग्रहण की प्रशासनिक और वित्तीय लागत से जुड़ी है। इतने बड़े स्तर पर डेटा एकत्रित करना, उसे सत्यापित करना और डिजिटल रूप से सुरक्षित रखना एक जटिल और महंगा कार्य हो सकता है। परंतु यदि इसे दीर्घकालिक निवेश के रूप में देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि इससे प्राप्त लाभ—जैसे बेहतर नीति निर्माण, संसाधनों का कुशल उपयोग और भ्रष्टाचार में कमी—इस लागत को उचित ठहराते हैं।

तकनीकी दृष्टि से देखें तो आज डिजिटल प्लेटफॉर्म, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा एनालिटिक्स के माध्यम से बड़े पैमाने पर डेटा का संग्रहण और विश्लेषण पहले की तुलना में अधिक आसान और प्रभावी हो गया है। यदि जनगणना को डिजिटल रूप में संचालित किया जाए और उसे अन्य सरकारी डेटाबेस—जैसे आधार, बैंकिंग और सामाजिक योजनाओं के डेटाबेस—के साथ समेकित किया जाए, तो एक समग्र और गतिशील डेटा प्रणाली विकसित की जा सकती है, जो समय–समय पर अद्यतन होती रहे और नीति निर्माताओं को वास्तविक समय में निर्णय लेने में सहायता प्रदान करे।

यह भी आवश्यक है कि जनगणना की प्रक्रिया में नागरिकों का विश्वास और सहभागिता सुनिश्चित की जाए। यदि लोग यह महसूस करें कि उनकी दी गई जानकारी का उपयोग उनके हित में किया जाएगा और उसकी गोपनीयता सुरक्षित रहेगी, तो वे अधिक सटीक और ईमानदार जानकारी प्रदान करेंगे। इसके लिए व्यापक जनजागरूकता अभियान, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व की व्यवस्था आवश्यक है।

अंततः यह स्पष्ट है कि 21वीं सदी के भारत के लिए जनगणना को केवल जनसंख्या की गणना तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं है। इसे एक ऐसे बहुआयामी उपकरण के रूप में विकसित करना होगा जो समाज के प्रत्येक वर्ग, क्षेत्र और व्यक्ति की वास्तविक स्थिति का समग्र चित्र प्रस्तुत कर सके। तभी सरकारें ऐसी नीतियाँ बना सकेंगी जो न केवल आर्थिक विकास को गति दें, बल्कि सामाजिक न्याय, समान अवसर और समावेशी प्रगति को भी सुनिश्चित करें। बहुआयामी भारतीय जनगणना ही वह आधार बन सकती है, जिस पर एक पारदर्शी, उत्तरदायी और विकसित राष्ट्र का निर्माण संभव हो सके।

— डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला

राजभाषा अधिकारी एनएमडीसी [भारत सरकार का एक उपक्रम] प्रशासनिक कार्यालय, डीआईओएम, दोणीमलै टाउनशिप जिला बेल्लारी - 583118 मो.-8759411563

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