सागर में उठने वाली हरेक लहरें तड़पाती हैं
नीले सागर में
चुपचाप बहती हवा
मन भी भीगा
लहरों की धुन
पुरानी यादों जैसा
मधुर कंपन
डूबता सूरज
अधूरी बातों का
सुनहरा रंग
भीगी पलकों पर
समुद्र की नमी का
गहरा असर
सीपियों के बीच
खामोशियों ने लिखे
दर्द के गीत
लहरों का शोर
भीतर की तन्हाई
और बढ़ाए
क्षितिज के पार
किसी की प्रतीक्षा
अब भी जीवित
चाँदनी रात में
सागर की बेचैनी
दिल तक पहुँचे
रेत की खुशबू
बिछड़े पलों को फिर
पास बुलाए
हर एक लहर
स्मृतियों के दीपक
धीमे जलाए
गहराई में छिपा
अनकहा सा दर्द
बहता जाए
सागर की आँखें
मानो किसी अपने
को ढूँढ़ रही हों
— डॉ. अशोक
