कहानी

स्वयंसिद्धा

आज सुलेखा के पांव जमीं पर नहीं पड रहे थे। पाँखों में हौसले का बल भर ऊँची उड़ान भरने में सफल हुई थी वह। “हां, मैं लिखती हूं। चलती है कलम मेरी, भावनाओं की अनुभूति बन। मेरे मन की खुशी, मेरा गम शब्दबद्ध करती हूं मैं।” वह लेखिका बनना चाहती थी। घर परिवार की जिम्मेदारियां निभाते वह अपना लक्ष्य साधना चाहती थी। “तलवार से भी तेज सत्यार्थी, बेबाक लेखनी है मेरी।”
“क्या ही कर लेगी लिखकर। बडे-बडे कलमकार ठगे से बैठे हैं। क्या आसमान के तारे तोड लोगी?
“क्या चंद शब्दों को माला में पिरोकर कालजयी कृति बना दोगी?”
कहनेवाले कहते रहे। उम्र के संध्या पड़ाव में कुछ मनमर्जी करना चाहती थी वह।
“नहीं, मुझे रूकना नहीं है। कोशिश करूंगी कलम के साथ न्याय करने की। मेरी जिंदगी है। मेरे सतरंगे सपने है। हां, मानती हूं, कलमकार को स्थापित होने में समय लगता है। लेखन चोरी की घटनाएं आम हैं।” 

जिद थी, जुनून था। कुछ कर दिखाने का दमखम रखती थी वह। आत्मविश्वास के साथ वह आगे बढती रही। संघर्ष करती रही।

“क्या मिलता है लिखकर? क्यों समय बर्बाद करती हो अपना?” पति महाशय, बच्चे भी पूछते। 

“परम संतुष्टी मिलती है जब मेरी रचना किसी को आनंदित करती हैं।

किसी भूले-भटके को सही राह दिखाती है। कभी किसी को फटकारती है कभी अँधेरे में छोटा सा दीप जलाती है। कभी मुरझाए मन में ताजगी भरती है।” 

उसे पता है,  कोशिश छोटी सी है।

जानती है वह, बूँद रेत में गिरते ही पलभर में लुप्त हो जाती है। 

“लेकिन बूँद से ही तो बेशकीमती मोती बनता है। बूँद ही ओस बन दमकती है।

बूँद बनकर भी मैं अपना अस्तित्व सशक्त करूंगी।” मन ही मन धार लिया था उसने।

आज जब कुछ पहचान बना पाई है, अपने सपनों को साकार होते देखकर मन अभिभूत है। खुशियाँ छलक रही है, कभी नयनों से, कभी शब्दों में।

“क्यों सच लिखकर जमाने से दुश्मनी करनी हैं?” नकारात्मक टिपण्णियां उसे हतोत्साहित करती रहती। पर उसने हिम्मत नहीं हारी। 

नजरअंदाज करती है वह ऐसी बातें। सकारात्मक आशावादी सोच के साथ जीवन पथ पर बढती जा रही है।

“मैं मेरी फेवरिट हूं।” उसकी सोच आधुनिक है, लेकिन वह जिम्मेदारी निभाना जानती है। स्वयंसिद्धा बनना चाहती है। 

मन हुंकार भरता है। शाब्बासी देता है।

नए जोश के साथ कल्पनालोक में भ्रमण करती है।

“मेरी अपनी जिंदगी है। अपने लिए भी जीना है मुझे।” 

उसने अपने आपको तराशा है।

सोच लिया है उसने, अब वह नहीं रुकेगी।

निखारती रहेगी अपना कौशल।

शब्द सखा हैं, शब्द ही माणिक मोती हैं।

आज वह हिंदी साहित्य जगत की सशक्त सम्माननीय हस्ताक्षर है।

सुलेखा की लेखनी बुराई पर प्रहार करती है। अधिकार के लिए चेतन हर आवाज को बुलंद करती है।

साथ ही वह बेटी, भगिनी, प्रिया, माता सभी रिश्तों को अपने स्नेह से सींचती है। संस्कार बीज बोकर सुंदर कल के सपने देखती है।

” तलवार से भी तेज कलम है सुलेखा जी की..”

उसका सम्मान किया ज रहा है। तालियों की गड़गड़ाहट में उसके जीत की हुंकार है।

” हाँ, मैं स्वयंसिद्धा हूँ।”

“चाहती हूँ हर नारी सक्षम बनें। अवरोधों को पार करते आगे बढे।”

अकेली ही चल पडी थी वह विकास पथपर। आज कारवाँ बन गया। स्वप्न पूर्ती की आभा से दमक रहा है उसका मुखमंडल। जो उसे पीछे धकेलने की कोशिश कर रहें थे, गुणगान कर रहे हैं अब।

 — चंचल जैन

*चंचल जैन

मुलुंड,मुंबई ४०००७८