सिग्नल खुलने से पहले
बचपन की कुछ स्मृतियाँ समय के साथ धुंधली नहीं पड़तीं, बल्कि और अधिक चमकने लगती हैं। वे याद आते ही पूरे शरीर में एक मीठी-सी सिहरन भर देती हैं। मेरे लिए ऐसी ही एक स्मृति है,गर्मियों की छुट्टियों में गाँव और नानीघर की यात्राएँ।
जैसे ही school में छुट्टियाँ घोषित होतीं, मन किसी पंछी की तरह उड़ने लगता। पहले गाँव जाना तय होता था,लगभग दस दिनों के लिए। वहाँ की मिट्टी, आम के पेड़, कुएँ का पानी, शाम की गोधूलि और रिश्तेदारों की आवाजाही सब किसी उत्सव जैसा लगता। फिर वहाँ से नानीघर की बारी आती, और हमारे भीतर उत्साह का एक नया मौसम उतर आता। इन यात्राओं का सबसे रोचक और रहस्यमय हिस्सा होते थे!! पापा ।
आज सोचती हूँ तो लगता है कि उन्हें हर स्टेशन से एक अजीब-सा लगाव था। ट्रेन किसी भी स्टेशन पर रुकती, और पापा लगभग तुरंत उतर जाते। कभी पानी लेने, कभी कुछ खाने की चीज़, तो कभी यूँ ही प्लेटफ़ॉर्म पर टहलते हुए।
लेकिन उनकी एक आदत हमें हर बार डरा देती थी। वे तब तक वापस नहीं आते थे, जब तक ट्रेन का सिग्नल न खुल जाए। और जैसे ही हरी बत्ती जलती, हमारे भीतर घबराहट शुरू हो जाती। ट्रेन धीरे-धीरे सरकने लगती, और हमारी आँखें खिड़की से बाहर प्लेटफ़ॉर्म पर पिताजी को खोजने लगतीं।
“पापा अभी तक नहीं आए” हम बार-बार कहते। माँ बाहर देखने लगतीं, और हम भाई-बहनों की हालत तो जैसे रोने वाली हो जाती। उस छोटे-से मन को लगता अब क्या होगा? ट्रेन चल दी तो? पापा छूट गए तो?
पर तभी… भीड़ के बीच से एक परिचित मुस्कान दिखाई देती। पिताजी तेज़ कदमों से हमारी बोगी की ओर आते दिखते — बिल्कुल निश्चिंत, बिल्कुल हँसते हुए। कभी उनके हाथ में आसनसोल की गरम पूड़ी-सब्ज़ी होती, कभी पेस्ट्री का डिब्बा, कभी कोई स्थानीय मिठाई।
वे जैसे ही डिब्बे में चढ़ते, हमारी जान में जान आती। और वे हँसकर कहते “अरे! ट्रेन इतनी जल्दी थोड़े ही छूट जाती है!”
तब उनकी बात पर गुस्सा भी आता था और राहत भी मिलती थी। समझ नहीं आता था कि आखिर उन्हें ऐसा करने में मज़ा क्यों आता है। लेकिन आज, वर्षों बाद, जब उन यात्राओं को याद करती हूँ, तो लगता है शायद वही उनका प्रेम जताने का तरीका था। वे केवल सफ़र नहीं कर रहे थे, हमारे बचपन के लिए यादें सहेज रहे थे। हर स्टेशन से थोड़ा स्वाद, थोड़ी खुशबू, थोड़ी खुशी और थोड़ा-सा रोमांच हमारे हिस्से में रख देते थे। तब समझ नहीं आता था कि खुलते सिग्नल के बीच भी पापा इतने निश्चिंत कैसे रह लेते हैं। पर अब लगता है उन्हें अपने बच्चों की धड़कनों पर पूरा भरोसा था, और अपने लौट आने पर भी।
आज भी जब कहीं ट्रेन रुकती है, प्लेटफ़ॉर्म पर पूड़ी-सब्ज़ी की महक आती है, या किसी स्टेशन पर भागते हुए यात्री दिखाई देते हैं, तो अनायास वही दृश्य आँखों में उतर आता है — भीड़ के बीच मुस्कुराते हुए पापा , हाथ में खाने का पैकेट, और हमारी बोगी की ओर तेज़ कदमों से आते हुए। समय बीत जाता है, यात्राएँ समाप्त हो जाती हैं, बच्चे बड़े हो जाते हैं। लेकिन पिता का स्नेह स्मृतियों की रेलगाड़ी में हमेशा हमारे साथ सफ़र करता रहता है।
— सविता सिंह मीरा
