लघुकथा – तलाक़ के बीच बालिका
रहमान और रेहाना दोनों खुश थे। जैसा एक-दूसरे को चाहते थे। वैसे ही मिले थे। हंसमुख स्वभाव के थे। दोनों ने प्रेम विवाह किया था। एक-दूसरे की बात बहुत आसानी से समझ लेते थे। समझदारी कूट-कूटकर भरी थी। दोनों सामाजिक थे। पड़ोसियों से भी बहुत अच्छा व्यवहार था।
शादी हुए तीन साल हो गये। रेहाना ने एक खूबसूरत लड़की का जन्म दिया था। घर में एक प्यारी बच्ची के आने से दोनों खुश थे। पूरे मोहल्ले में मिठाइयाँ बांटी गयी थी। पूरे मोहल्ले के लोगों ने बेटी के जन्म पर बधाई एवं शुभकामनाएं दी थी। बेटी के आगमन से घर की खुशियों में चार चांद लग गये।
समय बीतता गया। घर-गृहस्थी के तामझाम में कुछ पति पत्नी में खटर-पटर होना स्वाभाविक है। हालात इस कदर बढ़ता गया कि तलाक़ की नौबत आ गयी। खटपट के बाद रेहाना अपने मायके आ गयी। संभ्रांत लोगों तथा रिश्तेदारों ने खूब समझाया लेकिन तलाक तो तलाक।
तलाक होने के दिन दोनों के परिजन तथा रिश्तेदार एक रेस्टोरेंट में उपस्थित हुए। इस तलाक में बच्ची किसके साथ रहेगी। कुछ ने निर्णय दिया कि एक अबोध बालिका को मां की सख्त जरूरत होती है। बच्ची को माँ को सौंप दिया जाये। कुछ ने सिध्दांत दिया कि बच्ची की पढ़ाई-लिखाई तथा शादी का खर्च रेहाना नहीं उठा पायेगी। अत: बच्ची को रहमान को दे दिया जाये।
फैसले में बच्ची रहमान के पास रहेगी। रेहाना अपनी गोद में बच्ची को लिये थी। रहमान जैसे आगे बढ़ा बच्ची को लेने। बच्ची माँ से चिपक कर रोने लगी। फफक-फफककर जब रोने लगी। उपस्थित दोनों पक्षों के लोगों से झर-झर आंसू गिरने लगे। रहमान बच्ची को पकड़कर लेने की कोशिश करने लगा। बच्ची की रोने की आवाज और तेज हो गयी।जैसे बच्ची बाप से नफरत कर रही थी। इस तलाक में ममता जीत गयी।
फैसले के अनुसार बच्ची को रेहाना बेमन से रहमान को सौंपते हुए कहा– “मेरी बेटी का ख्याल रखना ” इतना कहकर फफक-फफककर रेहाना भी रोने लगी। मजबूर माँ रोती रही। गमों के बीच दोनों एक-दूसरे से अलग हो गये। बच्ची अपने पिता की गोद में तड़फ-तड़पकर रो रही थी। मचल-मचलकर छुड़ाने का प्रयास करती रही पर एक तलाक की जिद ने अबोध बालिका को माँ की ममता से अलग कर दिया।
— जयचन्द प्रजापति ‘जय’
