गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

तेरी यादें काँच के टुकड़े, मेरा इश्क़ नंगे पाँव,
हर गली से गुज़र रहा हूँ, ख़ून में डूबे पाँव।

तू मिला भी तो जैसे बारिश, रेत पर दो पल ठहरी,
मैं समंदर की तरह तन्हा, ढूँढता फिरता गाँव।

दिल ने हर दर्द चुपके-चुपके, तेरे नाम कर डाला,
लोग कहते रहे मुसाफ़िर, मुस्कुराता है जनाब।

रात भर चाँद से शिकायत, तेरी बातें करता हूँ,
नींद के दर पे बैठा रहता, आँख में लेकर घाव।

तेरी ख़ामोशियाँ भी अक्सर, चीख़ बन जाती हैं अब,
मैं जिसे सुकून समझा था, वो ही निकला इक दाव।

इश्क़ की राह में हमने तो, ख़ुद को ऐसे खोया है,
जैसे मंदिर में जलता दीपक, ख़ुद ही होता ख़ाक।

अब भी तेरी गली से गुज़रूँ, दिल धड़क उठता है,
तेरी यादें काँच के टुकड़े, मेरा इश्क़ नंगे पाँव।

— हेमंत सिंह कुशवाह

हेमंत सिंह कुशवाह

राज्य प्रभारी मध्यप्रदेश विकलांग बल मोबा. 9074481685

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