कविता

बारिश की बूंदे

बारिश की बूंदों को जलाना आ गया
क्या कहें उनको भी हराना आ गया
तीखे शब्द मेरे, पन्ने झेल नहीं पाए और
जेठ के महीने में भी सावन आ गया

गलियों को बहुत कुछ कहना आ गया
यादों के भँवर में उलझाना आ गया
पात्र बदले होंगे पर डूब नहीं पाए और
कहीं किसी को याद अफ़साना आ गया

अंत की सीढ़ी चढ़ी आरम्भ आ गया
टूटकर जुड़ने का स्वावलंब आ गया
लोहे की सांकले पिघल नहीं पाई और
सोने को तपाने का प्रारंभ आ गया

— सौम्या अग्रवाल

सौम्या अग्रवाल

पता - सदर बाजार गंज, अम्बाह, मुरैना (म.प्र.) प्रकाशित पुस्तक - "प्रीत सुहानी" ईमेल - soumyaagrawal2402@gmail.com

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