कविता

शब्द

अक्सर मैं रातों में
टकटकी लगाये
तारों को निहारता हूँ,
मेरी भावनाओं के हिसाब से
शब्दों को पुकारता हूँ।
शब्द-सागर से मंथन के बाद
अमृत-कलश निकालता हूँ,
बूंद रूपी शब्द को
करीने से सम्भालता हूँ।
फिर जैसे ही
कलश छलकने लगे,
उसे कागज़ों में
थोड़ा-थोड़ा बाँटता हूँ।
उस वक्त मुझे
असीम खुशियाँ मिलती हैं,
क्योंकि व्यंग्य-बाणों के बीच
मैं भी अपना जीवन काटता हूँ,
इसलिए
अपनी रचनाओं को सजाने खातिर
व्यंग्यात्मक शब्दों को छाँटता हूँ।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554

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