कहानी

नई ज़िंदगी

यह उस दौर की बात है जब इश्क़ ज़मानों और सरहदों का मोहताज नहीं हुआ करता था, बल्कि दो दिलों की ख़ामोश धड़कनों में सांस लेता था। उनकी मोहब्बत का सफ़र स्कूल के उन कच्चे दालान से शुरू हुआ था, जहाँ नज़रें उठतीं तो हया का हिजाब बन जातीं और झुकतीं तो दिल का अरमान बन जातीं।
वक़्त बदला, स्कूल की दहलीज़ पीछे छूटी और कॉलेज की आज़ाद फ़िज़ाओं ने इस्तक़बाल (स्वागत) किया। अब यह इश्क़ जवान हो चुका था और इसके साथ ही बढ़ गया था मुलाक़ातों का वह तड़पा देने वाला इंतज़ार। वह दौर मोबाइल फ़ोन की सस्ती गुफ़्तगू का नहीं, बल्कि जज़्बों की पाकीज़गी का दौर था। दिल के तमाम जज़्बात काग़ज़ के सफ़ेद सीने पर बिखर जाते। महीनों इंतज़ार के बाद जब कोई ‘लव लेटर’ (मोहब्बत का ख़त) मिलता, तो ऐसा लगता जैसे कायनात की सबसे बड़ी दौलत हाथ लग गई हो।रातों का जागना, चाँद को तकते हुए उसकी यादों में खो जाना, और ज़माने का वह ख़ौफ़ जो हर वक़्त साए की तरह साथ रहता था। मिलने में हज़ारों रुकावटें थीं, रस्म-ओ-रिवाज की दीवारें थीं, और पहरे सख़्त थे। लेकिन कहते हैं न कि इश्क़ अपनी राह ख़ुद बनाता है। रफ़्ता-रफ़्ता (धीरे-धीरे) होने वाली वह मुख़्तसर (छोटी) और चोरी-छिपे मुलाक़ातें वक़्त के साथ-साथ एक ऐसे गहरे इश्क़ में बदल गईं, जिसके बारे में दोनों का ख़्याल था कि यह अब ‘मुकम्मल’ हो चुका है। उन्हें लगता था कि कायनात की कोई ताक़त उन्हें जुदा नहीं कर सकती।
शाम ढल रही थी। आसमान पर सुर्ख़ (लाल) और स्याह (काले) बादलों का एक अजीब सा मेल था, ठीक वैसा ही जैसा रवि के दिल के भीतर जज़्बात का सैलाब था। मेज़ पर रखी चाय ठंडी हो चुकी थी, लेकिन उनके ज़हन में यादों की भट्टी अब भी सुलग रही थी।
उन्होंने अपनी हथेली को फैलाकर देखा। बचपन में किसी ने कहा था कि यह जो बीच की गहरी रेखा है, यह मंज़िल तक ले जाती है। उसके होंठों पर मुस्कुराहट थी,
“कैसी मंज़िल और कौन सा रास्ता? जब सफ़र का हमसफ़र ही मोड़ पर हाथ छोड़ गया, तो ये लकीरें महज़ सूखी ज़मीन पर पड़ी दरारों जैसी हैं, जिनमें अब कुछ नहीं उग सकता।”
बात ज़्यादा पुरानी नहीं थी, पर ऐसा लगता था जैसे सदियाँ गुज़र चुकी हों। जब इश्क़ हुआ था, तो ज़िंदगी के मायने बदल गए थे। वह दौर ख़्वाबों की ताबीर (पूरा होना) जैसा था। हर मुलाक़ात हसीन, हर गुफ़्तगू मुक़द्दर का इनाम लगती थी। उसे भी रवि से बेइंतहा मोहब्बत थी, इसमें कोई शक़ नहीं था। दोनों ने मिलकर न जाने कितनी ही हसीन मंज़िलों की चाह में ख़्वाबों के महल तामीर (निर्माण) किए थे। वक़्त अपनी रफ़्तार से गुज़र रहा था और रवि को लगता था कि वक़्त हमेशा उनका वफ़ादार रहेगा।लेकिन हक़ीक़त की ज़मीन बहुत सख़्त और बेरहम होती है। एक दिन अचानक सब बदल गया।
वह आई थी, लेकिन उसकी आँखों में वो पुरानी चमक और शरारत नहीं थी। उसकी पलकों पर आंसुओं की एक पूरी कतार थी और होंठों पर ऐसी ख़ामोशी जो दिल चीर दे। उसने कहा था,रवि शायद ये हमारी आख़िरी मुलाक़ात है। कुछ मजबूरियाँ ऐसी हैं जिनके आगे मैं बेबस हूँ। ज़माना, समाज और हालात हमें कभी एक होने नहीं देंगे। हमें यहीं जुदा होना होगा…”
रवि ने उसका हाथ थामना चाहा, पर वह अपना दामन छुड़ाकर चली गई। वह मुड़कर देख भी न सकी, शायद उसकी अपनी बेबसी थी, या कोई गहरी मजबूरी। लेकिन रवि के हिस्से में सिर्फ़ एक अंतहीन अधूरापन आ गया। उस एक पल में, बरसों के बुने हुए ख़्वाब शीशे के मानिंद (तरह) रेज़ा-रेज़ा (टुकड़े-टुकड़े) होकर बिखर गए।
शुरुआत के दिन किसी क़यामत से कम नहीं थे। तन्हाई डसती थी और हर ख़ाली कोना उसकी याद दिलाता था। दिल में एक ऐसा करब (गहरा दर्द) था जिसका कोई इलाज, कोई मरहम नहीं था। लोग आते, सांत्वना देते, हमदर्दी जताते और चले जाते। पर रवि ने जान लिया था कि मुकम्मल न होना ही शायद इस मोहब्बत का मुक़द्दर था।महीने गुज़रे, साल बदले। धीरे-धीरे रवि ने उस तन्हाई को ही अपना हमसफ़र बना लिया। उन्होंने अपने बिखरे हुए ख़्वाबों के टुकड़ों को समेटा, उन्हें कागज़ पर उतारा और शायरी का लिबास पहना दिया। जो ज़ख़्म ज़माने ने दिए थे, उन्होंने उन्हें अपनी शायरी के हुनर से सीना सीख लिया। उनका अधूरा इश्क़ अब लफ़्ज़ों की शक्ल में अमर हो रहा था।
आज भी जब कभी हवा का कोई सर्द झोंका कमरे के पर्दे हिलाता है, तो दिल का कोई कोना धड़क उठता है। लेकिन अब रवि की आँखों में आंसू नहीं, बल्कि एक ठहराव था। उन्होंने अपनी डायरी खोली, क़लम उठाई और आख़िरी सफ़े पर वो अलफ़ाज़ लिखे जो उनके पूरे वजूद की कहानी बयां कर रहे थे।उन्होंने डायरी बंद की। मोहब्बत अधूरी रह गई तो क्या, उसकी याद में लिखी गई दास्तान तो मुकम्मल हो चुकी थी।
डायरी बंद हो चुकी थी और कमरे में गहरी ख़ामोशी छाई थी। रवि अहमद ‘सहज’ ने कलम मेज़ पर रखा और खिड़की से बाहर देखने लगे, जहाँ अंधेरा अब पूरी तरह रात की चादर ओढ़ चुका था। हरदा की वह ख़ामोश रात रवि के दिल में छपे पुराने तूफ़ान को लोरियाँ सुनाकर सुलाने की कोशिश कर रही थी। उन्होंने सोचा था कि यह आख़िरी सतर (लाइन) लिखकर उन्होंने अपने दर्द का हिसाब बेबाक़ कर दिया है।
लेकिन ज़िंदगी अक्सर वहाँ से शुरू होती है जहाँ हम कहानी का इख़्तेताम (अंत) फ़र्ज़ कर लेते हैं।
अभी उन्होंने चाय का ख़ाली कप उठाया ही था कि अचानक बाहर के मुख्य दरवाज़े पर दस्तक हुई। रात के इस पहर, जब परिंदे भी अपने घोंसलों में दुबक चुके थे, ऐसी दस्तक ग़ैर-मुतवक़्क़ा (अचानक/अनपेक्षित) थी। रवि ने चौंककर घड़ी देखी,रात के ग्यारह बज रहे थे। दस्तक में कोई जल्दी नहीं थी, बल्कि एक अजीब सा धीमापन और हिचकिचाहट थी, जैसे कोई दरवाज़ा खटखटाने से ज़्यादा अपनी मौजूदगी का अहसास दिलाना चाहता हो।रवि ने अपने कंधों पर शाल दुरुस्त की और भारी क़दमों से चलते हुए दरवाज़े की तरफ़ बढ़े। जैसे ही उन्होंने कुंडी खोली, बाहर की ठंडी हवा का एक तेज़ झोंका उनके चेहरे से टकराया। सामने स्ट्रीट लाइट की मद्धम ज़र्द (पीली) रोशनी में एक नौजवान लड़का खड़ा था। उम्र यही कोई बाईस-तेईस साल, आँखों में एक अजीब सी इब्तिराब (बेचैनी) की लहर और हाथ में चमड़े का एक पुराना, बोसीदा (जर्जर) बैग।
रवि ने उसे ग़ौर से देखा। उसका चेहरा अनजान था, लेकिन उसकी आँखों की साख़्त (बनावट) और बात करने का अंदाज़… दिल के किसी कोने में एक अजीब सा कंपन पैदा कर गया।
“जी? आप कौन? और रात के इस वक़्त?” रवि ने धीमी मगर रोबीली आवाज़ में पूछा।
नौजवान ने कुछ कहने के लिए होंठ खोले, लेकिन उसकी आवाज़ हलक़ में फँस गई। उसने एक गहरा सांस लिया और कांपते हुए हाथों से अपने बैग में से एक पुराना, पीला पड़ चुका लिफ़ाफ़ा निकाला। उस लिफ़ाफ़े को देखते ही रवि के पाँवों तले से ज़मीन निकल गई। यह वही रेशमी डोर से बंधा हुआ ख़त था जो बीस साल पहले रवि ने अपने ख़ून-ए-दिल से लिखा था, जिसकी ख़ूशबू ज़माने की गर्द में कहीं खो चुकी थी।
“मेरा नाम ‘राज़’ है…” नौजवान ने लर्ज़ती (कांपती) आवाज़ में कहा। “मैं शहर से आया हूँ और यह अमानत मुझे आप तक पहुँचाने के लिए कही गई थी।”
रवि ने लर्ज़ते हाथों से वह ख़त लिया। उनके ज़हन में सस्पेंस और सवालों का एक ऐसा सैलाब उमड़ आया जिसने उनके इतने सालों के ‘ठहराव’ को एक ही झटके में उखाड़ फेंका। उन्होंने लड़के को अंदर आने का इशारा किया।
कमरे की मद्धम रोशनी में जब रवि ने उस ख़त के साथ बंधी हुई एक छोटी सी डायरी खोली, तो उस पर उनकी महबूबा के हाथ की लिखी हुई तहरीर (लिखावट) थी। वह तहरीर जो आज से बीस साल पहले की उस ‘आख़िरी मुलाक़ात’ का वह सच उगलने वाली थी जिससे रवि आज तक बेख़बर थे।
डायरी के पन्नों पर जगह-जगह आंसुओं के सूखे हुए निशान थे और लिखा था:
रवि, जब तुम यह पढ़ रहे होगे, शायद मैं इस दुनिया के क़ैदख़ाने से आज़ाद हो चुकी हूँगी। तुमने उस दिन मुझसे पूछा था न कि मेरी आँखों की चमक कहाँ खो गई? तुमने समझा कि मैं ज़माने के डर से, ख़ानदानी मजबूरियों के आगे झुककर तुम्हारा हाथ छोड़ रही हूँ। काश! काश वह सिर्फ़ ज़माने का डर होता रवि, तो मैं दुनिया से लड़ जाती।
हक़ीक़त यह थी कि उस मुलाक़ात से महज़ दो दिन पहले डॉक्टरों ने मुझे बताया था कि मेरे पास जीने के लिए चंद महीने ही बचे हैं। एक ऐसी जानलेवा बीमारी मेरे वजूद को अंदर से खा रही थी जिसका कोई इलाज न था। मैं तुम्हें घुट-घुट कर मरते नहीं देख सकती थी। मैं नहीं चाहती थी कि तुम्हारा यह जवान और ख़ूबसूरत इश्क़ अस्पताल के बिस्तरों और दवाइयों की बू में दम तोड़ दे।
इसलिए मैंने ख़ुद को तुम्हारी नज़रों में बेवफ़ा साबित किया। मैंने वह ज़हर का घूंट पिया ताकि तुम मुझसे नफ़रत कर सको, क्योंकि मोहब्बत का दर्द इंसान को ज़िंदा रखता है, लेकिन किसी का सामने दम तोड़ना इंसान को अंदर से मार देता है। मैंने हमारी मोहब्बत की आख़िरी निशानी,इस बच्चे (राज़) को जन्म दिया और इसे अपने एक मुख़्लिस (सच्चे) दोस्त के हवाले कर दिया कि जब यह जवान हो जाए, तो तुम्हें मेरा यह आख़िरी सच बता दे।
यह पढ़ना था कि रवि के हाथ से डायरी छूटकर फ़र्श पर गिर गई। वह शख़्स जो अभी कुछ मिनट पहले कह रहा था कि “मैंने ज़ख़्मों को भर लिया है”, उसके ज़ब्त (धैर्य) का बंधन ताश के पत्तों की तरह बिखर गया। उनकी आँखों से आंसुओं का वह सैलाब रवां (बहना) हुआ जो बीस सालों से पत्थर बन चुका था।
उन्हें अपनी हथेली की वह लकीर याद आई जिसके बारे में उन्होंने सोचा था कि वह सूखी ज़मीन की दरारें हैं। नहीं! वे दरारें नहीं थीं, वे तो उस अज़ीम (महान) क़ुर्बानी का रास्ता थीं जो उनकी महबूबा ने ख़ामोशी से तय किया था। जिसे वह अधूरापन समझ रहे थे, वह तो इश्क़ की मेअराज (शिखर) थी, जहाँ एक रूह ने दूसरी रूह को बचाने के लिए अपनी ज़ात (अस्तित्व) को मिटा दिया था।
रवि ने सामने खड़े नौजवान ‘राज़’ को देखा। उसके चेहरे में, उसकी आँखों में, उसी की झलक थी,उनके स्कूल और कॉलेज के दौर की मासूमियत।
रवि आगे बढ़े और उन्होंने अपने बेटे (राज़) को सीने से लगा लिया। वह करब, वह अधूरापन, वह बीस साल का सफ़र जो तन्हाई में गुज़रा था, उस एक गले मिलने से मिट गया।
कमरे की खिड़की से अब एक नई सुबह का नूर (उजाला) अंदर आ रहा था, अंधेरा छट रहा था। रवि ने फ़र्श से गिरी हुई डायरी उठाई, कलम दोबारा हाथ में लिया और अपनी उस सतर (लाइन) को काट दिया जो उन्होंने रात को लिखी थी। अब उन्होंने ज़िंदगी के आख़िरी सफ़े पर एक नया और सच्चा अंजाम लिखा।
बाहर की फ़िज़ाओं में परिंदों की चहचहाहट शुरू हो चुकी थी, और अब रवि के दिल में कोई शिकवा नहीं, बल्कि अपनी मोहब्बत के लिए एक अटूट सम्मान और अपने बेटे की शक्ल में एक नई ज़िंदगी का आग़ाज़ था।

— डॉ. मुश्ताक अहमद शाह ‘सहज’

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।

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