बाल कविता

कुर्सियों का किला

कुर्सियों का किला बनाया,
घर के बीचों-बीच।
तीनों बच्चे खेल रहे थे,
खुशियाँ लेकर नीड़।

कुशन रखकर छत बना ली,
दीवारें भी चार।
छोटा-सा वह घर लग रहा,
जैसे सुंदर द्वार।

कोई राजा, कोई रानी,
कोई वीर जवान।
अपनी-अपनी भूमिका में,
मगन हुए नादान।

बाहर खड़ी बड़ी बहना,
देख रही मुस्काय।
छोटे दोनों किले के अंदर,
बैठे आँखें फैलाय।

खेल-खेल में सीख रहे थे,
मिलकर रहना साथ।
प्रेम, हँसी और अपनापन ही,
जीवन की है बात।

हँसी-ठिठोली, सपने, मस्ती,
इनका यही जहान।
कुर्सियों के इस किले में,
बसता है बचपन महान।

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh

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