डायरी के पन्ने
.. और अपने हिस्से की सारी तकनीकी पढ़ाई समाप्त कर लेने के बाद भी जब कोई प्लेटफ़ॉर्म नहीं मिला तब घर वालों के समझाने बुझाने पर वर्ष 2009 में मैंने अपना ट्रैक बदलने का निर्णय लिया. उस समय मेरे राज्य में शिक्षक बहाली जोरों पर थी. इसलिए मैंने भी बीएड करने का निश्चय किया और पाँच-छः (सभी अपने गृह राज्य से बाहर) विश्वविद्यालयों में बीएड की प्रवेश परीक्षा के लिए फॉर्म भर दिया और सब जगहों पर जा कर प्रवेश परीक्षा भी दी.
सबसे पहले वेस्ट बंगाल स्टेट यूनिवर्सिटी बारासात के अंतर्गत संचालित राष्ट्रीय स्तर के संस्थान- ‘एनआईएमएच’ से बीएड (स्पेशल एजुकेशन) की प्रवेश परीक्षा का परिणाम आया और भैया के लाख समझाने (कि यह पढाई कठिन है और अंग्रेजी में है, तुमसे हो नहीं पायेगी) के बाद भी मैंने इस कोर्स में नामांकन ले लिया. नयी जगह और नए माहौल में अंग्रेजी माध्यम की पढाई देख जल्द हीं मेरा दिमाग ठिकाने लग गया. यह कोर्स विशेष आवश्यकता वाले मानसिक मंदता युक्त बच्चों के पुनर्वास संबंधी अध्ययन पर आधारित था. मुझे यह लगने लगा कि भैया का कहना सही था, यह कोर्स मुझसे न हो पायेगा. दिक्कत पढाई से नहीं थी…. दिक्कत अंग्रेजी माध्यम में होने वाली पढाई (जो मुझे बिलकुल हीं समझ में नहीं आती) से थी, क्योंकि मैं बचपन से हीं हिंदी माध्यम के विद्यालय में पढ़ा था. इस कारण पढाई से मेरा मन जल्दी हीं उचटने लगा.
कोर्स फी बर्बाद होने और घर वालों के नाराज होने के डर से किसी तरह दो-तीन महीने खींचे गये. कॉलेज के सभी शिक्षक बहुत अच्छे और अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ थे. परन्तु शिक्षण का माध्यम अंग्रेजी होने से मुझे बहुत दिक्कत होती थी. मुझे तो अंग्रेजी में छुट्टी की एक एप्लीकेशन तक लिखनी नहीं आती थी तो भला ये कोर्स कैसे कम्प्लीट होता..! जब सारे जतन करने के बाद भी कुछ चमत्कार नहीं हुआ तो मैंने पढाई छोड़, घर वापस लौटने का निर्णय लिया. उस समय मन अजीब द्वन्द में फंसा था. एक तरफ कोर्स फी में लगे पैसे और भविष्य की चिंता थी तो दूसरी तरफ अंग्रेजी का भूत मेरे पीछे पड़ा था. सहपाठियों के कहने पर मैं अपने कोर्स कोर्डिनेटर—अलकनन्दा मैम से मिला. मैम ने मुझे बहुत समझाया और मेरी हिम्मत बढाई. उन्होंने मुझे बहुत से हिंदी माध्यम के नोट्स व स्टडी मैटेरियल्स आदि उपलब्ध कराये. अलकनन्दा मैम के स्नेह और उनकी प्रेरणा ने मुझे पढाई छोड़, घर वापस लौटने के अपने निर्णय को बदलने पर विवश कर दिया. मैं दुगुने उत्साह और आत्मविश्वास के साथ सब कुछ छोड़ पढाई में लग गया. धीरे-धीरे मेरी स्थिति सुधरने लगी और मैं अपनी कक्षा के केंद्र में आने लगा. यूँ तो कॉलेज के सभी शिक्षक बहुतअच्छे थे परन्तु मेरा मानना है कि– यदि छात्र की समस्या, समय पर उसके शैक्षिक स्तर की जानकारी और छात्र के स्तर के अनुसार अध्यापन की योजना का प्रबंधन किया जाय तो निश्चय हीं किसी छात्र को पढाई छोड़, घर वापस लौटने की नौबत नहीं आएगी. मेरे अनुभवों के अनुसार एक शिक्षक को सबसे पहले संवेदनशील अवश्य होना चाहिए.
कॉलेज के तत्कालीन प्रभारी- श्री थॉमस सर, ओक्युपेश्नल थेरापी के श्री अमिताभ सर, फिजियोथेरपी की श्रीमती वाजपेयी मैम, स्पीच थेरापी की श्रीमती शेरोन मैम, आईइपी की सुश्री त्रिपर्णा मैम और न्यूरो के डा. अनिर्वाण बासू सर ने अपने सर्वोत्तम अनुभव और ज्ञान के भण्डार हम सभी छात्रों पर उंडेल दिए. परन्तु इन सब से अलग मुझे जिस शिक्षक ने वास्तव में समझा वे थीं– अलकनन्दा मैम और सौमि मैम. अलकनन्दा मैम को मै जीवन पर्यंत कभी भूल नहीं सकता. मैंने अपने छात्र जीवन में सर्वाधिक परिश्रम बीएड (स्पेशल एजुकेशन) कोर्स में की थी. यहाँ इस बात का उल्लेख करना कोई मायने नहीं रखता कि मेरे उस बीएड कोर्स का आगे क्या हुआ? परन्तु यहाँ, यह अवश्य उल्लेखनीय है कि ‘एनआईएमएच’ से बीएड (स्पेशल एजुकेशन) की पढाई करना मेरे लिए अद्भुत और अविस्मरणीय रहा.
मेरे सहपाठी मित्र– चंचल, सुरेश, विलाश, सुरजीत, रतन, सिवान्शु, दीपांकर, श्यामल, अफसर आलम, विजय, कृष्णकांत, कन्हाई, इशिता, पियाली, पामेला, श्वेता, रूपा, मीता, गौरी, सिस्टर मैरी कुट्टी अंटोनी और ‘मानसी‘ सहित अन्य सभी मित्रों की बहुत याद आती है. यह अजीब संयोग है कि मेरे छात्र-जीवन का प्रथम और अंतिम छात्रावासी अध्ययन कोलकाता में हीं हुआ.
— कल सिवान्शु से लगभग 16 वर्षों के बाद फोन पर हुई बातचीत के दौरान यह पता चला कि अलकनन्दा मैम ने अब ‘एनआईएमएच’ छोड़ दिया है…….!
मैं अब दूसरे प्रोफेशन में हूँ और तकनीकी प्रशिक्षक के रूप में 16 वर्षों से राजकीय सेवा में हूँ, परन्तु बॉन हूगली, अनन्या, बरानगर, डनलप, बैरकपुर और पुराने ‘एनआईएमएच’ की बहुत याद आती है ……!
— चन्द्र मणि पाण्डेय
