कविता

गजबे शोर था भाई

गजबे शोर था भाई
वो भी अजबे दौर था भाई
जब बढ़ रही थी महंगाई
तब किसने शोर मचाई
सत्ता की लालसा पाले
अच्छे दिन की बात करने वाले
तुम्हारा गजबे शोर था भाई
वो भी अजबे दौर था भाई
धर्म की अगुवाई में
राजनीति की लड़ाई में
राम राज ने ली अंगड़ाई
तब तुमने गजबे शोर मचाई
अक्ल के अंधों ने तो
कुछ सोचा ना,समझा भाई
और धर्म की देने लगे दुहाई
जरा सोच तो लेते एक बार
अब जो ठहरे बेरोजगार
कहाँ गया वो दो करोड़ रोजगार
टैक्स का बढ़ता लूटमार
तो कैसे थमेगा भ्रष्टाचार
सच तो यही है भाई
की तुम्हें तो राम राज के
भावनाओ ने बहकाया,
चने के झाड़ तुम्हें चढ़ाया,
जरा सोच तो लेते भाई,
बिना सोचें ही तुमने
हिंदू राष्ट्र की कसमें खाई
झुठलों की सरकार बनाई
तुमने जोश में होश खोया था भाई
वो भी गजबे दौर था भाई
यह भी अजबे दौर हैं भाई
अब तो दोगुनी हो गई महंगाई
अच्छे दिन अब तक समझ ना आई
सरकार की मनमानी ने
नेताओं की खानदानी ने
ऐसी लुट मचाई कोई ना बच सका भाई
और तुमने फिर से शोर मचाई
अब भी होश खोए हो या
सब कुछ देखते हुए भी सोए हो
अगर बात समझ में आए
तो अन्याय के खिलाफ सख्त बनो
यू सब कुछ देखते हुए भी
चुप रहकर अंधभक्त ना बनो।

— रेबेल रमेश खटकर

रेबेल रमेश खटकर

मुकाम पोस्ट चिरमिरी (छ ग़)

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