दोहा
मकरंद
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फूलों के मकरंद से, बनता शहद मिठास।
भंवरों को भी इसी से, होती ज्यादा आस।।
बूँद-बूँद मकरंद में, प्रकृति का अनुराग।
चख लेता है जो इसे, कह देता बेदाग।।
भँवरे लेकर जा रहे, फूलों से मकरंद।
पंखुड़ियाँ उनसे कहे, आना बिन छल-छंद।।
फूलों से मकरंद का, चोली दामन साथ।
मेहनत करते हैं भ्रमर, लगता उनके हाथ।।
जीवन हो मकरंद सा, घोलें आप मिठास।
मन कड़वाहट दूर कर, बिखराइए सुवास।।
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पैसा
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पैसा ही सब कुछ नहीं, जाने सकल जहान।
फिर भी कब है छोड़ता, स्वार्थ लोभ अभिमान।।
पैसे वालों को लगे, वही आज भगवान ।
नहीं समझते एक दिन, करना जगत पयान।।
बिन पैसा जग में कहाँ, मिलता है अब मान।
रिश्ते-नाते व्यर्थ सब, कलयुग बड़ा महान।।
भाई-भाई बीच में, पैसा डाले फूट।
जो बनता नादान है, खूब रहा है लूट।।
चाहे जितना पास में, पैसा हो भरपूर।
रिश्ते नाते हो रहे, सब ही सबसे दूर।।
माना पैसा आपको, दे सुख-सुविधा खूब।
पर इसके अभिमान में, सब कुछ जाता डूब।।
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अन्न
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अन्न बिना इस जगत का, व्यर्थ ज्ञान- विज्ञान।
सभी करें सम्मान जब, वेद पुराण पहचान।।
भोजन उतना थाल में, जितना खा लें आप।
नहीं फेंक कर कीजिए, नाहक निशदिन पाप।।
मात अन्नपूर्णा कृपा, हमको मिलता अन्न।
खाना जो तुम फेंकते, करता नहीं क्या सन्न।।
इक-इक दाना अन्न का, होता है अनमोल।
पढ़ना भी तो चाहिए, श्रम इतिहास भूगोल।।
भोजन की कीमत कहाँ, समझ रहे सब लोग।
केवल वे ही जानते, जिनको भूखा रोग।।
रोटी की कीमत तभी, जब लगती है भूख।
अन्न बिना इस जगत में, जाते प्राणी सूख।।
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गोपाल
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मम गिरधर गोपाल का, मोह रहा है रूप।
जिसकी जैसी भावना, वैसे दिखे अनूप।।
रूप देख गोपाल का, मैया थी हैरान।
जो थी उनकी असलियत, उसे गईं पहचान ।।
कृपा आप इतनी करो, सुनो नंद गोपाल।
पापी जितने जगत में, उनका बनिए काल।।
खेल बहुत अब हो चुका, सुन लो मेरी पुकार।।
आ जाओ गोपाल अब, बिना किसी तकरार।।
जन मानस बेचैन है, मानो अब गोपाल।
आकर धरा का देखिए, आँखों देखा हाल।।
कलयुग के इस दौर में, त्राहि मची है आज।
अब तो आकर आप ही, करिए कोई इलाज।।
बंशी को विश्राम दो, अब मेरे गोपाल।
जन मानस बेचैन है , आओ देखो हाल।।
आप सुदर्शन रख कहाँ, भूल गए गोपाल।
या फिर चलते आप हैं, गहरी कोई चाल।।
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कहानी
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आप कहानी क्यों हमें, सुना रहे हो मित्र।
क्या कुछ होगा फायदा, या केवल है चित्र।।
एक कहानी मानिए, इस जीवन को आप।
केवल इतना मैं कहूँ, नहीं लगेगा पाप।।
बचपन में सबने सुनी, कई कहानी रोज।
बच्चे अब पाते नहीं, दादी नानी खोज।।
किसको रखना याद है, यह सबका अधिकार।
हमें बुलाना चाहिए, सोच बड़ी बेकार।।
लिखो कहानी आप भी, रोका किसने हाथ।
कोई आयेगा नहीं, चलकर देने साथ।।
एक कहानी तुम लिखो, कहें मित्र यमराज।
बात हमारी मान लो, या खोलूँ मैं राज।।
लिखते रहते हम सभी, एक कहानी नित्य।
समझ नहीं बस पा रहे, क्या इसका औचित्य।।
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सामना
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किसका किस्से सामना, समझ रहे हैं लोग।
जिसे नहीं खुद का पता, वो ही बनते रोग।।
रावण का जब सामना, हुआ युद्ध मैदान।
ज्ञानी वो इतना बड़ा, हुआ नहीं हैरान।।
भाई-भाई सामने, व्यर्थ अड़ाना टाँग।
दोषी सब तुमको कहें, पी आए क्या भाँग।।
किया सामना धैर्य से, लेकर प्रभु का नाम।
बिना किसी तकरार के, मिली सफलता काम।।
हम दोनों का सामना, होगा अंतिम बार।
नहीं पता परिणाम का, फिर भी हैं लाचार।।
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साधना
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सबकी अपनी साधना , सबका अपना भाव।
कुछ को मिलता प्रेम रस, कुछ को गहरा घाव।।
काम सभी है साधना, करें नहीं हम भेद।
फिर क्यों करते व्यक्त हैं, नाहक में ही खेद।।
साधक करता साधना, स्वार्थ लोभ को छोड़।
सतत लगा जब वो रहे, तब पाता है मोड़।।
करते रहिए साधना, मन रखकर उत्साह।
प्रतिफल इसका जब मिले, तभी लगेगा थाह।।
नहीं साधना में रही, पहले वाली बात।
अब तो इसकी आड़ में, होते हैं आघात।।
मन वाणी सद्भावना, है जिसकी पहचान।
उस साधक की साधना, ईश्वर का वरदान।।
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छलावा
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आप छलावा कर रहे, बनकर बड़े महान।
पर ये दुनिया जानती, बनी हुई पहचान।।
पाक छलावा नित करे, रोज बदलकर रंग।
पर उसके छल-छंद में, पड़ जाता है भंग।।
अपने भी करने लगे , आज छलावा खूब।
जैसे भी हो चाहते, आप जाइए डूब।।
किसे छलावा का पता, भला नहीं है ज्ञात।
इसीलिए तो हो रहा, नित विकसित प्रतिघात।।
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नवतपा
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नौ दिन का यह नवतपा, करता है बेहाल।
आस सभी की बस यही, वारिश ही अब ढाल।।
रौद्र रुप दिखला रहा, हमें नवतपा आप।
जीव- जंतु व्याकुल सभी, मान रहे हैं पाप।।
गर्मी अपने चरम पर, बरस रही है आग।
नीत नियम से नवतपा, कैसे भूले राग।।
प्रकृति संग में नवतपा, करता अपना काम।
व्यर्थ नहीं चिंता करे, होकर भी बदनाम।।
कहता हमसे नवतपा, धैर्य न छोड़ो आप।
जल जंगल अरु जमीं से, मत करिए संताप।।
आग उगलते नव तपा, पशु पक्षी हलकान।
धरती अंबर जल रहे, भट्ठी बने मकान।।
वन-उपवन सब सूखते, सूख रहे जल स्रोत।
जीव-जंतु व्याकुल सभी, करें मेघ स्त्रोत।।
तपता है आकाश अब, निकलें प्राणी प्राण।
करनी का फल मिल रहा, कौन करेगा त्राण।।
आग बरसती मेघ से, करते हम अनुरोध।
सजा माफ कर दीजिए, बालक बड़े अबोध।।
कहें मित्र यमराज जी, करिये मेघ विचार।
बहुत हो चुका आपका, इतना अधिक प्रचार।।
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बधाई
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सभी बधाई दे रहे, आप करो स्वीकार।
बना इसे ही लीजिए, जीवन का आधार।।
सत्कर्मो की राह पर, चलना तेरा काम।
मान बधाई ईश की, लिख तू नव आयाम।।
इतनी मिली बधाइयाँ, क्यों करना अभिमान।
ईश्वर की तुझ पर कृपा, मान इसे वरदान।।
आप बधाई व्यर्थ दे, करते हो उपहास।
इसीलिए रखता नहीं, कभी किसी से आस।।
दौर बधाई में घुला, आज स्वार्थ का रंग।
ऊपर तो मुस्कान है, भीतर घोलें भंग।।
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विविध
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कंद मूल अब आजकल, कहाँ का रहे लोग।
इसीलिए तो बढ़ रहा, नित-नित नूतन रोग।।
राम लखन अरु सीय ने,वन में चौदह वर्ष।
कंद मूल फल खाय के, रचा नया उत्कर्ष।।
रक्षक ही भक्षक बने, कैसे बचेंगे प्राण।
जन-मन नित ही रो रहा, सहता रहता त्राण।।
प्रभु रक्षक हैं जगत के, रखते सबका ध्यान।
और हमें विश्वास है, व्यर्थ सभी विज्ञान।।
बागी बनकर खींचते, अपने दल की टाँग।
सत्ता के कुछ लालची, पीकर बैठे भाँग।।
जनहित के संदेश का, सदा करें सम्मान।
और आप भी कीजिए, बने सफल अभियान।।
युद्ध सभी को दे रहा, नित नूतन संदेश।
जिसकी सीमा है नहीं, एक देश परदेश।।
हमको जो तुम दे रहे, ज्ञाता बड़का मान।
पहले इतना सीख लो, अपना रखना ध्यान।।
तुमको रखना चाहिए, मात-पिता का ध्यान।
इसमें ऐसा क्या नया, लेना जो गुरु ज्ञान।।
मात-पिता बस चाहते, करना कन्या दान।
भले और कुछ भी हमें, मत देना भगवान।।
करना पड़ता है सदा, बिटिया कन्या दान।
हृदय वेदना का भला, रहता कब है ध्यान।।
मुश्किल है जग में बड़ा, करना कन्या दान।
रोते राजा रंक सब, विचलित भी भगवान।।
पत्रकार जब से बिके, फैला भारी द्वंद्व।
करते मिलकर हम सभी, बिन समझे छल-छंद।।
केवल उनको हम सभी, दोषी लेंगे मान।
नया आज का है नहीं, बिकने का विज्ञान।।
बिकी देश की मीडिया, नहीं सत्य ये बात।
फिर भी जो हैं बिक गए, खाते जूता लात।।
कलयुग का यह रंग है, स्वाभिमान पर चोट।
बिकी देश की मीडिया, खुश हैं नाली लोट।।
इतना सरपट भागना, भारी पड़ेगा मित्र।
नजर नहीं जो आ रहा, रखा सामने चित्र।।
सरपट दौड़ो आप यदि, मुश्किल में जब जान।
भले कोई अपना नहीं, करिए जीवन दान।।
बिना शोक के बढ़ रहा, कहिए उसे अशोक।
भला लगाता कौन है, इस पर कोई रोक।।
कहें मित्र यमराज भी, बनिए आप अशोक।
चलना निज कर्तव्य पथ, बिना रोक या टोक।।
धरा दहकती इन दिनों, झुलस रहे हैं लोग।
बादल भी ललचा रहा, कहता करनी भोग।।
बादल खूब उड़ा रहे, हम सबका उपहास।
गर्मी से दहके धरा, व्यर्थ हमारी आस।।
गर्मी इतनी पड़ रही, इसमें किसका दोष।
बादल तो निर्दोष है, नाहक उस पर रोष।।
पेड़ काट अपना करो, तुम तो रोज विकास।
मेघ बिचारा क्या करे, टूट रही जब आस।।
नेकी करना चाहते, खूब कीजिए आप।
मगर पुण्य की राह में, मिल सकता है पाप।।
बहुत रुलाया आपने, यह कैसा है प्यार।
क्या ये मेरा दंड है, या तेरा उपहार।।
कोई रिश्ता है नहीं, फिर भी इतना प्यार।
गर्व और अधिकार से, नखरे करे हजार।।
नटखट गुड़िया एक थी, बनी हुई जंजाल।
विदा हुई ससुराल जब, तब से मैं कंगाल।।
कितनी सुंदर लग रही, बैठी है स्वच्छंद।
उसे देख लगता नहीं, मन उसके है द्वंद्व।।
अपने जीवन के लिए, बस मेरा अनुरोध।
आप बनो दुश्मन नहीं, मैं हूँ बहुत अबोध।।
इतनी अधिक अभद्रता, बन जाए कब रोग।
नहीं पता यह आज है, कल का क्या संयोग।।
धृष्ट व्यक्ति यदि आप हैं, इसमें किसका दोष।
तुमने तनिक विचार कर, किया कभी क्या रोष।।
धृष्ट व्यक्ति की धृष्टता, है उसकी पहचान।
इसी भूल में कर रहा, खुद पर वह अभिमान।।
हम सब भी तो कह रहे, वो हैं बड़े गँवार।
पाल पोसकर आपका, जीवन दिया संवार।।
अख्खड़पन के आदती, आते कब है बाज।
उनको लगता हैं वहीं, इस जग के सरताज।।
लोभी लम्पट का सदा, होता है अपमान।
कामी, क्रोधी, अवगुणी, इनकी है पहचान।।
सूख रहे हैं अब हलक, धरा वृक्ष अरु प्राण।
आज यही सबसे बड़ा, मानवता का त्राण।।
सूखे वृक्ष के पास में, बैठा एक किसान।
नहीं समझ वो पा रहा, पापी हम इंसान।।
सूखे वृक्ष को देखकर, विचलित हुआ किसान।
क्या ऐसे ही एक दिन, होंगे हम बेजान।।
लाचारी है कृषक की, टूट रही है आस।
किस्मत भी करने लगी, नित नूतन परिहास।।
सूख गए अब वृक्ष भी, हुए पूर्ण निष्प्राण।
कृषक बिचारा क्या करे, सहता मुश्किल त्राण।।
पहन मखमली वस्त्र वो, नाहक करें घमंड।
खटमल के संग काटते, नहीं जेब में फंड।।
आज रजाई पर पड़ी, परिवर्तन की मार।
कंबल में हम ढ़ूँढ़ते, अब तो इसका सार।।
जैसे-जैसे शीत ऋतु, आता है नजदीक।
सभी रजाई खोजते, अपने-अपने लीक।।
ढ़ूँढ रहे यमराज जी, अपने लिए रजाई।
ठंडी आ द्वारे खड़ी, कहने लगी लुगाई।।
ओढ़ रजाई काटते, किसी तरह अब रात।
रहन-सहन सबका अलग, सबकी अपनी बात।।
कौन मानता आजकल, कहाँ किसी की बात।
सब हैं केवल चाहते, देना दूजा मात।।
बहुत रुलाया आपने, क्या पाया परिणाम।
नासमझी में कर दिया, व्यर्थ उसे बदनाम।।
छोड़ खुमारी आइए, आप सभी मैदान।
सोकर खोना व्यर्थ है, जाने सकल जहान।।
चुप्पी का मतलब नहीं, समझें हम कमजोर।
बिन बोले जब काम हो, फिर क्यों करना शोर।।
कभी -कभी चुप्पी बड़ी, करती ऐसे काम।
रच देती है प्रेम से, शांत सौम्य आयाम।।
चुप्पी के विज्ञान का, करते रहिए शोध।
कहीं उचित है चीखना, बनना कहीं अबोध।।
मातु-पिता के पाँव में, है बागेश्वर धाम।
हाथ शीश जिनके रहे, उसके बनते काम।।
बागेश्वर के धाम का, नाम गूँजता आज।
शीश सजेगा एक दिन, विश्व भारती ताज।।
बाबा बागेश्वर कहें, जात-पात अरु कर्म।
हर भारतवासी कहे, सत्य सनातन धर्म।।
होती भारी भीड़ है, निशदिन सुबहो-शाम।
बाबा बागेश्वर का, गूँज रहा नित नाम।।
कर्म कमाई आपकी, कहाँ आपके साथ।
हम सब ही हैं जानते, जाना खाली हाथ।।
किया कमाई आपने, हानि-लाभ को देख।
अब क्यों पल्ला झाड़ते, छपा देख आलेख।।
मानव जीवन कुछ नहीं, बस केवल अतिरेक।
पद पैसा पहचान का, करते सब अभिषेक।।
समझ नहीं वे पा रहे, देते हम जो मान।
संकट आता सामने, तब उनको हो ज्ञान।।
अपने गुण का व्यर्थ ही, करिए नहीं बखान।
कर्म और व्यवहार से, बनता व्यक्ति महान।।
आज नहीं गुण को मिले, जो उसकी पहचान।
स्वार्थ लोभ में कर रहे, हम इसका गुणगान।।
गुण-अवगुण सबमें भरा, जान रहे हैं लोग।
अपने-अपने ढंग से, करते इसका भोग।।
हर प्राणी का स्वप्न है, हो अपना आवास।
जिससे हम भी कर सकें, सुखदा जीवन रास।।
दौर आज का देखिए, अब ऐसे आवास।
जिसमें बस आनंद का, होता नित्य ह्रास।।
कंकड़ पत्थर जोड़ कर, बनते अब आवास।
जिसमें करते हम सभी, मजबूरी में वास।।
मसला सबका है अलग, नहीं अड़ाएँ टाँग।
यहाँ बैठने से भला, खाएँ चलकर भाँग।।
मिर्च मसाला तेल का, कम करिए उपयोग।
स्वस्थ रहेंगे हम सभी, दूर रहेगा रोग।।
मातु-पिता आदान को, कहें सभी कर्तव्य।
आती बारी आपनी, हम देते वक्तव्य।।
सतगुरु की इतनी कृपा, देते हमको ज्ञान।
जीवन पथ शुभकामना, करते सदा प्रदान।।
कहना, करना भिन्न है, जान रहे हम आप।
भोले बनते सामने, पीछे खुलकर पाप।।
कहना, करना भिन्न है, नई नहीं ये बात।
तब भी कहता है मनुज, दिन को काली रात।।
कहना, करना भिन्न है, कहकर चीखें लोग।
खुद तो ऐसा ही करें, कहें जगत का रोग।।
सुबह-सुबह ही नौतपा, कहने आया आज।
क्या भेजा था आपने, मेरे ढिग यमराज।।
व्यर्थ बुराई आप सब, करते मानस हंस।
पहले खुद को देखिए, कौन बड़ा कंस।।
सुधीर श्रीवास्तव
