संसार से भागे फिरते हो
क्यों मन मलिन उदास सखे,
याद किसी की आई है?
बैठे हो सरि के कूल पर
दखे किसकी परछाई है?
क्यों चौंक मुड़े तुम यों कहो ,
भ्रमित नूपुर-झंकार का,
नूपुर नहीं, मन की वीणा,
क्रंदन है यह प्यार का।
वह आई थी सब तज कर,
तुमको प्राण बनाने को,
तुम सुन न सके उर स्पंदन ,
क्या कहती वह ज़माने को?
तुमने ही उसके मन पर,
प्रहार किया था प्यार से,
निष्ठुर बन कैसे बोले,
आई हो किस अधिकार से?
जो आघात किया तुमने,
सोचा उस पर क्या बीता ?
सरि-कूल बैठ विकल विरही ,
जियो जीवन रीता रीता ।
— सविता सिंह मीरा
